शनिवार, 4 अप्रैल 2015

Shri Hnuman Upasana (श्रीहनूमान उपासना)

बल, बुद्धि, विकास के लिए करें हनुमानजी की उपासना:
श्रीराम भक्त हनूमान (ज्ञानिनामग्रगन्यम्) अर्थात ज्ञानियों में श्रेष्ठ ज्ञानी हैं । इस घोर कलियुग में अपने भक्तों पुकार शीघ्रता से सुनते हैं, और उसका कल्याण करते है । धर्म शास्त्रों के अनुसार हनुमान जी का जन्म चैत्र के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा माना जाता है । इसलिए प्रतिवर्ष चैत्र पूर्णिमा को हनुमान जयंती के रूप में यह उत्सव मनाया जाता है, जो इस वर्ष पूर्णिमा 4 अप्रैल 2015 दिन शनिवार​ को है । 
देखा जाए तो हनुमान जी की उपासना के अनेको विधी विधान प्रचलन में है, परन्तु यह समय बार- बार उपलब्ध नहीं हो पाता । इस बार 4 अप्रैल 2015 को प्रात: 06:26 am. से ही खण्डग्रास चन्द्र ग्रहण का सूतक लग रहा है, साथ ही शनिवार का दिन जो हनुमानजी की उपासना का महत्वपूर्ण समय माना गया है । हालाकि उपासक दिन में हनुमान जी के सहित किसी भी देवता की पूजा नहीं कर सकेंगे परन्तु रात्रि में 08 pm. बजे से यह अनुष्ठान अवश्य प्रारम्भ किया जा सकता है ।

कैसे करे उपासना:
ग्रहण काल की समाप्ती के बाद साफ सफाई कर स्नान करें, बाल्मीकि रामायण के अनुसार हनुमान जी का जन्म कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को हुआ है। आज के दिन हनुमान जी का षोड्शोपचार पूजन करें। पूजन के उपचारो मे गंधपूर्ण तेल मे सिंधूर मिलाकर उससे मूर्ति चर्चित करें। पुन्नाम (हजारा, गुलहजारा) आदि के फूल चढ़ाए और नैवैद्य मे चूरमा या आटे के लड्डू व फल इत्यादि अर्पण करके ‘वाल्मिकीय रामायणऽ अथवा श्री राम चरितमानस के सुंदरकाण्ड का पाठ करें। हनुमत जयंती के पावन अवसर पर हनुमान चालीसा, हनुमत अष्टक व बजरंग बाण का पाठ करने से शनि, राहु व केतु जन्य दोषों से मुक्ति पाई जा सकती है। इस दिन सुंदर कांड का पाठ करते हुए अष्टादश मंत्र का जप भी करना चाहिए। 

अष्टादश मंत्र -
॥ॐ भगवते आन्जनेयाय महाबलाय स्वाहा॥
इस मंत्र जाप 108 माला करें.. 

कुशल ब्राह्मणों के द्वारा यह अनुष्ठान कराने हेतु आप हमसे सम्पर्क कर सकते हैं।
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शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

Vastu tips (वास्तु टिप्स)

वास्तु टिप्स :- जिनसे घर में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है. :-

वास्तु सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा के सिद्धांत पर काम करता है। वास्तु के नियमों का पालन करते हुए जरूरी कार्यों में दिशाओं का ध्यान रखा जाता है तो घर का वातावरण शुभ रहता है।

खाना खाते समय ध्यान रखें ये बातें :-
१. वास्तु की मान्यता है कि पूर्व की ओर मुख करके भोजन करने से आयु बढ़ती है।
२. जो लोग उत्तर दिशा की ओर मुख करके भोजन करते हैं, उन्हें लंबी आयु के साथ ही लक्ष्मी कृपा भी प्राप्त होती है।
४. दक्षिण दिशा, यम की दिशा मानी जाती है और इस ओर मुख करके खाना खाने से भय बढ़ता है। बुरे सपने दिखाई देते हैं।
३. पश्चिम दिशा की ओर मुख करके खाना खाते हैं तो भोजन से स्वास्थ्य लाभ प्राप्त नहीं हो पाता है। ध्यान रखें हमें उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके भोजन ग्रहण करना चाहिए।
५. हमेशा जमीन पर बैठकर ही भोजन करना चाहिए। थाली को जमीन पर न रखें, किसी चौकी या आसन पर रखना चाहिए।

दिशाएं और वास्तु अनुसार उनके नाम :-
उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम दिशाओं के साथ ही चार दिशाएं और बताई गई हैं। ये इस प्रकार हैं... उत्तर-पूर्व को ईशान कोण कहा जाता है। उत्तर-पश्चिम को वायव्य कोण, दक्षिण-पूर्व को आग्नेय कोण एवं दक्षिण-पश्चिम को नैऋत्य कोण कहा जाता है।
१. घर का मुख्य द्वार पूर्व या उत्तर दिशा में हो तो श्रेष्ठ रहता है, लेकिन ऐसा न हो तो घर के मुख्य द्वार पर स्वास्तिक, श्रीगणेश का चिह्न लगाना चाहिए।
२. घर के मुख्य द्वार पर तुलसी का पौधा रखना चाहिए। सुबह-सुबह तुलसी को जल अर्पित करें। शाम को तुलसी के पास दीपक जलाएं। पूर्व या उत्तर दिशा में तुलसी लगाने से आत्म विश्वास में बढ़ोतरी होती है।
३. घर में खिड़की, दरवाजों की संख्या सम हो तो शुभ रहता है। सम यानी २, ४, ६, ८ या १०. दरवाजे खिड़कियां अंदर की तरफ ही खुलना चाहिए, यह श्रेष्ठ रहता है।
४. घर में फालतू और बेकार सामान नहीं होना चाहिए। इस चीजों से घर में तनाव बना रहता है।
५. दीवार या छत पर दरार हो तो उन्हें जल्दी ठीक करवा लेना चाहिए।
६. धन संबंधी लाभ चाहते हैं तो तिजोरी का मुंह उत्तर या पूर्व दिशा में रखना चाहिए। धन के स्थान को सुगंधित बनाए रखना चाहिए। इसके लिए अगरबत्ती, इत्र, परफ्यूम आदि का उपयोग किया जा सकता है।
७. तिजोरी के दरवाजे पर कमल के आसन पर बैठी हुई महालक्ष्मी की तस्वीर लगानी चाहिए।
८. दक्षिण की दीवार पर दर्पण नहीं लगाना चाहिए। दर्पण पूर्व या उत्तर की दीवार पर होगा तो श्रेष्ठ रहेगा।
९. शाम के समय कुछ देर के लिए पूरे घर में रोशनी अवश्य करनी चाहिए।
१०. घर में मकड़ी के जाले नहीं होना चाहिए। ऐसा होने पर राहु ग्रह से अशुभ फल प्राप्त होते हैं।

Sankashti vrat (संकष्टी उपवास)

हिन्दू कैलेण्डर में प्रत्येक चन्द्र मास में दो चतुर्थी होती हैं। पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहते हैं और अमावस्या के बाद आने वाली शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहते हैं। हालाँकि संकष्टी चतुर्थी का व्रत हर महीने में होता है लेकिन सबसे मुख्य संकष्टी चतुर्थी पुर्णिमांत पञ्चाङ्ग के अनुसार माघ के महीने में पड़ती है और अमांत पञ्चाङ्ग के अनुसार पौष के महीने में पड़ती है। संकष्टी चतुर्थी अगर मंगलवार के दिन पड़ती है तो उसे अंगारकी चतुर्थी कहते हैं और इसे बहुत ही शुभ माना जाता है। पश्चिमी और दक्षिणी भारत में और विशेष रूप से महाराष्ट्र और तमिल नाडु में संकष्टी चतुर्थी का व्रत अधिक प्रचलित है।

भगवान गणेश के भक्त संकष्टी चतुर्थी के दिन सूर्योदय से चन्द्रोदय तक उपवास रखते हैं। संकट से मुक्ति मिलने को संकष्टी कहते हैं। भगवान गणेश जो ज्ञान के क्षेत्र में सर्वोच्च हैं, सभी तरह के विघ्न हरने के लिए पूजे जाते हैं। इसीलिए यह माना जाता है कि संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने से सभी तरह के विघ्नों से मुक्ति मिल जाती है। 

संकष्टी चतुर्थी का उपवास कठोर होता है जिसमे केवल फलों, जड़ों (जमीन के अन्दर पौधों का भाग) और वनस्पति उत्पादों का ही सेवन किया जाता है। संकष्टी चतुर्थी व्रत के दौरान साबूदाना खिचड़ी, आलू और मूँगफली श्रद्धालुओं का मुख्य आहार होते हैं। श्रद्धालु लोग चन्द्रमा के दर्शन करने के बाद उपवास को तोड़ते हैं। 

उत्तरी भारत में माघ माह के दौरान पड़ने वाली संकष्टी चतुर्थी को सकट चौथ के नाम से जाना जाता है। इसके साथ ही भाद्रपद माह के दौरान पड़ने वाली विनायक चतुर्थी को गणेश चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। सम्पूर्ण विश्व में गणेश चतुर्थी को भगवान गणेश के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। तमिल नाडु में संकष्टी चतुर्थी को गणेश संकटहरा या संकटहरा चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। 

कैसे करें संकष्टी गणेश चतुर्थी:
चतुर्थी के दिन सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इस दिन व्रतधारी लाल रंग के वस्त्र धारण करें। श्रीगणेश की पूजा करते समय अपना मुंह पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर रखें। तत्पश्चात स्वच्छ आसन पर बैठकर भगवान गणेश का पूजन करें। फल, फूल, रौली, मौली, अक्षत, पंचामृत आदि से श्रीगणेश को स्नान कराके विधिवत तरीके से पूजा करें। श्री गणेश को तिल से बनी वस्तुओं, तिल-गुड़ के लड्‍डू तथा मोदक का भोग लगाएं। ॐ सिद्ध बुद्धि सहित महागणपति आपको नमस्कार है। नैवेद्य के रूप में मोदक व ऋतु फल आदि अर्पित है। तत्पश्चात गणेशजी की आरती करें। इस दिन अपने सामर्थ्य के अनुसार गरीबों को दान करें। तिल-गुड़ के लड्डू, कंबल या कपडे़ आदि का दान करें। 

विद्यार्थियों के लिए:
भगवान गणपती बुद्धी के प्रधान देवता हैं, भगवान गनपती की आराधना से ऐसे बच्चे जिनका मन पढाई में न लग रहा हो, याद बहुत करते है परंतु सब व्यर्थ हो जाता है । ऐसे बच्चे बुद्धिप्रदाता भगवान गणेश की आराधना करके अपना भविष्य उज्वल कर सकते हैं । इस अनुष्ठान में गणपती उपासना गणपत्युपनिषत् का 21 पाठ व हवन सम्मलित है ।

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बुधवार, 1 अप्रैल 2015

Shri yantram adoration (श्रीयंत्रम् उपासना)

यंत्रमित्याहुरेतस्मिन देव: प्रीणाति:।

शरीरमिव जीवस्य दीपस्य स्नेहवत प्रिये ॥ ____कुलार्णव तंत्र

यंत्र मन्त्रों का ही चित्रात्मक रूप है और देवी-देवता अपने निर्धारित यंत्रों में स्वयं वस करते हैं । पूजा-स्थल पर यंत्रों को स्थापित करके उनकी पूजा-अर्चना करने से उत्तम फल की प्राप्ति होती है । भुवनेश्वरीक्रम चंडिका में "भगवान शिव देवी पार्वती से कहते हैं, कि हे पार्वती! जिस प्रकार प्राणी के लिए शरीर अवश्यक है, उसी प्रकार देवताओं के लिए यंत्र आवश्यक है ।


यंत्र वास्त्व में सजगता को धारण करने का एक माध्यम माना गया है । यंत्रों की विभिन्न आकृतियाँ होती हैं, जैसे त्रिकोण, अधोमुख, वर्गाकार, पंचकोणाकार आदि । यंत्र पूजन से भक्त अपने इष्टदेव की कृप सहज ही प्राप्त करलेता है ।

वेदों के अनुसार सभी यंत्रों में श्रीयंत्र का स्थान प्रथम है, श्रीयंत्र में ३३ कोटि देवताओं का वास है । कलियुग में श्रीयंत्रको कामधेनु के समान माना गया है । श्रीयंत्र शीघ्र प्रभाव दिखाने वाला यंत्र माना गया है । यह यंत्र सिद्ध होने पर सभी प्रकार की श्री अर्थात चारों पुरुषार्थ की प्राप्ती होती है । श्रीयंत्र में वस्तुदोष निवारण की भी अभूतपूर्व क्षमता है ।

श्रीविद्या की उपासना ही श्रीयंत्र की उपासना है। श्रीविद्या पंचदशाक्षरी बीज मंत्रों से ही श्रीयंत्र बना है। श्रीयंत्र की उपासना का विधान तो बहुत ही लंबा है। श्रीचक्र बाजार से लेकर दर्शन करने से उसका कोई फल नहीं है। जब तक प्राण-प्रतिष्ठा न की गई हो। गुरु परंपरा से न बनाया गया हो। तांत्रिक अनुष्ठान की विधि पूर्ण होना आवश्यक है। यंत्र का वजन सही हो। रेखाएं साफ हों, तभी दर्शन का फल है।

प्राण-प्रतिष्ठित श्रीयंत्र को लें। पंचोपचार से पूजन करने के बाद इस यंत्र को पूर्ण ब्रह्मांड जानें, और अपने शरीर को भी वही जानें, फिर एकाग्रता के साथ शुद्ध घी के दीप की लौ का दर्शन करें और इस श्लोक का नित्य १००० बार उच्चारण करें। 


यंत्र प्रत्यक्ष हो, यंत्र के मध्य बने बिंदु को देखते हुए यह कार्य होना चाहिए। यह क्रिया ४५ दिन तक लगातार हो। 


भवानि त्वं दासे मयि वितर दृष्टिं सकरुणामिति स्तोतुं वाञ्छन कथयंति भवानि त्वमिति य:।

तदैव त्वं तस्मै दिशसि निज सायुज्यपदवीं मुकुन्द ब्रह्मेन्द्रस्फुटमकुट नीराजितपदाम॥

यह अनुभूत प्रयोग है..


महान खोजों के क्रम में ऽश्रीयंत्रऽ की खोज भी एक विस्मयकारी खोज है, जो कि आज के संतप्त मानव को हर प्रकार की शांति प्रदान करने में पूर्ण समर्थ है। ब्रह्मांड का प्रतीक श्री विद्या के यंत्र को ऽश्रीयंत्रऽ कहते हैं या ऽश्रीचक्रऽ कहते हैं। यह अकेला ऐसा यंत्र है, जो समस्त ब्रह्मांड का प्रतीक है। श्री शब्द का अर्थ लक्ष्मी, सरस्वती, शोभा, संपदा, विभूति से किया जाता है। यह यंत्र श्री विद्या से संबंध रखता है। श्री विद्या का अर्थ साधक को लक्ष्मी़, संपदा, विद्या आदि हर प्रकार की ऽश्रीऽ देने वाली विद्या को कहा जाता है।

यह परम ब्रह्म स्वरूपिणी आदि प्रकृतिमयी देवी भगवती महात्रिपुर सुंदरी का आराधना स्थल है। यह चक्र ही उनका निवास एवं रथ है। यह ऐसा समर्थ यंत्र है कि इसमें समस्त देवों की आराधना-उपासना की जा सकती है। सभी वर्ण संप्रदाय का मान्य एवं आराध्य है। यह यंत्र हर प्रकार से श्री प्रदान करता है जैसा कि दुर्गा सप्तशती में कहा गया है-

आराधिता सैव नृणां भोगस्वर्गापवर्गदा

आराधना किए जाने पर आदिशक्ति मनुष्यों को सुख, भोग, स्वर्ग, अपवर्ग देने वाली होती है। उपासना सिद्ध होने पर सभी प्रकार की ऽश्रीऽ अर्थात चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति हो सकती है। इसील‍िए इसे ऽश्रीयंत्रऽ कहते हैं। इस यंत्र की अधिष्ठात्री देवी त्रिपुर सुंदरी हैं। इसे शास्त्रों में विद्या, महाविद्या, परम विद्या के नाम से जाना जाता है। वामकेश्वर तंत्र में कहा है-

सर्वदेव मयी विद्या

दुर्गा सप्तशती में- विद्यासि सा भगवती परमाहि देवि।

हे देवी! तुम ही परम विद्या हो। इस महाचक्र का बहुत विचित्र विन्यास है। यंत्र के मध्य में बिंदु है, बाहर भूपुऱ, भुपुर के चारों तरफ चार द्वार और कुल दस प्रकार के अवयय हैं, जो इस प्रकार हैं- बिंदु, त्रिकोण, अष्टकोण, अंतर्दशार, वहिर्दशार, चतुर्दशार, अष्टदल कमल, षोडषदल कमल, तीन वृत्त, तीन भूपुर। इसमें चार उर्ध्व मुख त्रिकोण हैं, जिसे श्री कंठ या शिव त्रिकोण कहते हैं। पांच अधोमुख त्रिकोण होते हैं, जिन्हें शिव युवती या शक्ति त्रिकोण कहते हैं। आदि शंकराचार्य ने सौंदर्य लहरी में कहा-

चतुर्भि: श्रीकंठे: शिवयुवतिभि: पश्चभिरपि

नवचक्रों से बने इस यंत्र में चार शिव चक्र, पांच शक्ति चक्र होते हैं। इस प्रकार इस यंत्र में ४३ त्रिकोण, २८ मर्म स्थान, २४ संधियां बनती हैं। तीन रेखा के मिलन स्थल को मर्म और दो रेखाओं के मिलन स्थल को संधि कहा जाता है।


  • नवचक्र


  1. बिन्दु तथा महाबिन्दु :- मूलकारण महात्रिपुर सुन्दरी कामेश्वर कामेश्वरी सामरस्य जगत की मूल योनि तथा शिवभाग
  2. त्रिकोण - आद्या विमर्शशक्ति या जीव भाव शब्द अर्थरूपी सृष्ति की कारणात्मिका पराशक्ति अहंभाव एवं जीव तत्व
  3. अष्टार - पुर्यष्टक कारण शरीर लिंगशरीर का कारण
  4. अन्तर्दशार- इन्द्रियवासना लिंग शरीर
  5. बहिर्दशार- तन्मात्रा तथा पंचभूत (इन्द्रिय विषय)
  6. चतुर्दशार- जाग्रत स्थूल शरीर
  7. अष्टदल- अष्टारवासना
  8. षोडसदल- दशारद्वय वासना
  9. भूपुर- बिन्दु त्रिकोण अष्टदल षोडसदल इन चारों की समष्टि प्रमातृपुर और प्रमाणपुर का पशुपदीय प्रकृति मन बुद्धि अहंकार और शिवपदीय शुद्ध विद्यादितत्वचतुष्टय का सामरस्य।


  • नवचक्रों के देवता और नाम के संकेत


  1. सर्वानन्दमय  -   महात्रुपुरसुन्दरी
  2. सर्वसिद्धिप्रद - त्रिपुराम्बा
  3. सर्वरोगहर -त्रिपुरसिद्धा
  4. सर्वरक्षाकर- त्रिपुरमालिनी
  5. सर्वार्थसाधक - त्रिपुरश्री
  6. सर्वसौभाग्यदायक - त्रिपुरवासिनी
  7. सर्वसंक्षोभणकारक- त्रिपुर सुन्दरी
  8. सर्वाशापरिपूरक - त्रिपुरेशी
  9. त्रैलोक्यमोहन - त्रिपुरा

यही नवावरण पूजा के नव देवता है,मतान्तर से इन्हे प्रकटा गुप्ता गुप्ततरा परा सम्प्रदाया कुलकौला निगर्भा अतिरहस्या परापरातिरहस्या इत्यादि नाम से भी पुकारते हैं।


  • श्रीयंत्र का शब्दार्थ


श्रीयंत्र का सरल अर्थ है - श्री का यंत्र अर्थात गृह। नियमनार्थक यम धातु से बना यंत्र शब्द गृह अर्थ को ही प्रकट करता है। क्योंकि गृह में ही सब वस्तुओं का नियंत्रण होता है। श्रीविद्या को ढूंढने के लिये उसके गृह श्रीयंत्र की ही शरण लेनी होगी। आगे श्री अर्था श्रीविद्या के परिचय से ज्ञात होगा कि वह उपास्य और उपेय दोनों है। उपेय वस्तु को उसके अनुकूल स्था ही अन्वेषण करने से सिद्धि होती है,अन्यथा मनुष्य उपहासास्पद बनता है। आदि कवि श्रीवालमीकिनी ने श्रीसीताजी के अन्वेषण में तत्पर श्रीहनुमानजी के द्वारा कहलाया है- "यस्य सत्त्वस्य या योनिस्तस्यां तत्परिमार्ग्यते",अर्थात जिस प्राणी की जो योनि होती है वह उसी में ढूंढा जा सकता है। भगवान शंकराचार्य ने भी यंत्र का उद्धार देते हुये "तव शरणकोणा: परिणत:" इस वाक्य में यंत्र के अर्थ में गृहवाचक शरण पद का प्रयोग किया है। इस न्याय से उत्तरभारत एवं दक्षिण भारत में स्थित श्रीनगर नामक स्थानो की सार्थकता सिद्ध होती है। क्योंकि इतिहास इस बात का साक्षी है कि इन नगरों में श्रीविद्या के उपासक अधिक संख्या में मिलते थे,और अब भी थोडे बहुत पाये जाते है। अस्तु यह विश्व ही श्रीविद्या का गृह है। यहां विश्व शब्द से पिण्डाण्ड एवं ब्रह्मांड दोनो का ग्रहण है। मायाण्ड प्रकृत्यण्ड भी स्थूल सूक्ष्म रूप से इन्ही के अन्तर्गत आ जाता है,यह आगे चलकर ततद्विशेष यंत्रों के विवरण से विशेषतया स्पष्ट हो जायेगा।


शनिवार, 28 मार्च 2015

Satyanarayan Fast story (सत्यनारायण व्रत कथा)

भगवान सत्यनारायण की कथा इह​ लोक में प्रचलित है। कुछ लोग मनौती (मनोकामना) पूरी होने पर, कुछ अन्य नियमित रूप से इस कथा का आयोजन करते हैं। सत्यनारायण व्रतकथाके दो भाग हैं, व्रत-पूजा एवं कथा। सत्यनारायण व्रतकथा स्कंद पुराण के रेवाखंड से संकलित की गई है। सत्यनारायण व्रतकथा पुस्तिका के प्रथम अध्याय में यह बताया गया है कि सत्यनारायण भगवान की पूजा कैसे की जाय।

जो व्यक्ति सत्यनारायण की पूजा का संकल्प लेते हैं उन्हें दिन भर व्रत रखना चाहिए। पूजन स्थल को गाय के गोबर से पवित्र करके वहां एक अल्पना बनाएं और उस पर पूजा की चौकी रखें। इस चौकी के चारों पाये के पास केले का वृक्ष लगाएं। इस चौकी पर ठाकुर जी और श्री सत्यनारायण की प्रतिमा स्थापित करें। पूजा करते समय सबसे पहले गणपति की पूजा करें फिर इन्द्रादि दशदिक्पाल की और क्रमश: पंच लोकपाल, सीता सहित राम, लक्ष्मण की, राधा कृष्ण की। इनकी पूजा के पश्चात ठाकुर जी व सत्यनारायण की पूजा करें। इसके बाद लक्ष्मी माता की और अंत में महादेव और ब्रह्मा जी की पूजा करें।

पूजा के बाद सभी देवों की आरती करें और चरणामृत लेकर प्रसाद वितरण करें। पुरोहित जी को दक्षिणा एवं वस्त्र दे व भोजन कराएं। पुराहित जी के भोजन के पश्चात उनसे आशीर्वाद लेकर आप स्वयं भोजन करें।

उद्देश्य
सत्यनारायण व्रत का अनुष्ठान करके मनुष्य सभी दु:खों से मुक्त हो जाता है। कलिकाल में सत्य की पूजा विशेष रूप से फलदायीहोती है। सत्य के अनेक नाम हैं, यथा-सत्यनारायण, सत्यदेव। सनातन सत्यरूपीविष्णु भगवान कलियुग में अनेक रूप धारण करके लोगों को मनोवांछित फल देंगे।

क्यूं करते हैं
सत्यनारायण भगवान की कथा लोक  प्रचलित है। सत्यनारायण व्रतकथाके दो भाग हैं, व्रत-पूजा एवं कथा। सत्यनारायण व्रतकथास्कंदपुराणके रेवाखंडसे संकलित की गई है। सत्यनारायण व्रत का अनुष्ठान करके मनुष्य सभी दु:खों से मुक्त हो  जाते हैं! कलिकाल में सत्य की पूजा विशेष रूप से फलदायी होती है। सत्य के अनेक नाम हैं, यथा-सत्यनारायण, सत्यदेव। सनातन सत्यरूपीविष्णु भगवान कलियुग में अनेक रूप धारण करके लोगों को मनोवांछित फल देते हैं।

कब करते है
सत्यनारायण व्रत मुख्य रूप से पूर्णिमा,एकादशी, जन्मदिवस​, विवाह के समय और संक्रान्ति आदि में किया जाता है ! कुछ लोग मनौती पूरी होने पर, कुछ अन्य नियमित रूप से इस कथा का आयोजन करते हैं। 

कैसे करते हैं
जो व्यक्ति सत्यनारायण की पूजा का संकल्प लेते हैं उन्हें दिन भर व्रत रखना चाहिए। पूजन स्थल को गाय के गोबर से पवित्र करके यदि गोबर उपलब्ध न हो तो पिसी हल्दी से लीप कर रंगोली भरें। उस रंगोली पर काठ की चौकी रखें। इस चौकी के चारों पाये के पास केले का वृक्ष लगाएं। इस चौकी पर श्री सत्यनारायण की प्रतिमा स्थापित करें। पूजा करते समय सबसे पहले गणपति की पूजा करें।

शान्ती पाठ,  गणपति जी की षोडसोप्चार विधी से पूजन, वरुण कलश का पूजन, नवग्रह पूजन​, षोडशमात्रिका पूजन   श्रीराधाकृष्ण​,  भगवान श्रीसत्यनारायण की पूजा,  भगवान श्रीसत्यनारायणजी का अभिषेक, भगवान श्रीसत्यनारायण  कथा , कथा के बाद सभी देवों की आरती करें और चरणामृत लेकर प्रसाद वितरण ! 

शुक्रवार, 13 मार्च 2015

Samvatsar results (संवत्सर परिणाम)

भारतीय संस्कृति में चन्द्र वर्ष का प्रयोग किया जाता है । चन्द्र वर्ष को ही संवत्सर कहा जाता है ।ब्रह्माजी  ने सृष्टि का आरम्भ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से किया था अतः नव संवत का प्रारम्भ भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है ।हिंदू परंपरा में समस्त शुभ कार्यों के आरम्भ में संकल्प करते समय उस समय के संवत्सर का उच्चारण किया जाता है ।अग्नि ,नारद आदि पुराणों में वर्णित साठ संवत्सरों के नाम तथा उनके वर्ष में विश्व में होने वाले शुभाशुभ फल निम्नलिखित प्रकार से है —


संवत्सर का नाम              वर्ष फल

  1. प्रभव - प्रजा में यज्ञादि शुभ कार्यों कि भावना हो ।
  2. विभव - प्रजा में सुख समृद्धि हो ।
  3. शुक्ल - विश्व में धान्य प्रचुर मात्रा  में हो ।
  4. प्रमोद - प्रजा में आमोद प्रमोद ,सुख वैभव कि वृद्धि हो ।
  5. प्रजापति - विश्व में चतुर्विध उन्नति हो ।
  6. अंगिरा - भोग विलास कि वृद्धि हो ।
  7. श्री मुख - जनसँख्या में अधिक वृद्धि हो ।
  8. भाव - प्राणियों में सद्भावना बढे ।
  9. युवा - मेघों द्वारा प्रचुर वृष्टि हो ।
  10. धाता - विश्व में समस्त औषधियों कि वृद्धि हो ।
  11. ईश्वर- आरोग्य व क्षेम कि प्राप्ति हो ।
  12. बहुधान्य - अन्न कि प्रचुरता हो ।
  13. प्रमाथी - शुभाशुभ प्रकार का मध्यम वर्ष हो ।
  14. विक्रम - अन्न कि अधिकता रहे ।
  15. वृष - प्रजा जनों का पोषण हो ।
  16. चित्रभानु - विचित्र घटनाएं हों ।
  17. सुभानु - आरोग्यकारक व कल्याणकारी वर्ष हो ।
  18. तारण - मेघों द्वारा शुभकारक वर्षा हो ।
  19. पार्थिव - धन​ संपत्ति कि वृद्धि हो ।
  20. अव्यय - अतिवृष्टि हो ।
  21. सर्वजीत - उत्तम वृष्टि का योग ।
  22. सर्वधारी - धान्यों कि अधिकता ।
  23. विरोधी - अनावृष्टि ।
  24. विकृति - भय कारक घटनाएं ।
  25. खर - पुरुषों में साहस व वीरता का संचार ।
  26. नंदन - प्रजा में आनंद ।
  27. विजय - दुष्टों का नाश ।
  28. जय - रोगों का शमन ।
  29. मन्मथ - विश्व में ज्वर का प्रकोप ।
  30. दुर्मुख - मनुष्यों कि वाणी में कटुता ।
  31. हेम्लम्बी - सम्पदा कि वृद्धि।
  32. विलम्बी - अन्न कि प्रचुरता ।
  33. विकारी - दुष्ट व शत्रु कुपित हों ।
  34. शार्वरी - कृषि में वृद्धि।
  35. प्लव - नदियों में बाढ़ का प्रकोप ।
  36. शुभकृत - प्रजा में शुभता ।
  37. शोभकृत - शुभ फलों कि वृद्धि।
  38. क्रोधी - स्त्री –पुरुषों में वैर ,रोग वृद्धि।
  39. विश्वावसु - अन्न महंगा ,रोग व चोरों कि वृद्धि,राजा लोभी ।
  40. पराभव - रोग वृद्धि, प्रचुर वृष्टि, राजा का तिरस्कार 
  41. प्ल्वंग - कृषि हानि, प्रजा में रोग व चोरी, राजाओं का युद्ध ।
  42. कीलक - पित्त विकार, मध्यम वर्षा, सर्प भय, प्रजा में कलह ।
  43. सौम्य - राजा प्रसन्न ,शीत प्रकृति के रोग, मध्यम वर्षा ,सर्प भय।
उपरोक्त साठ संवत्सर बारह युगों में होते हैं जिनके स्वामी क्रमशः विष्णु, बृहस्पति, इंद्र, लोहित, त्वष्टा, अहिर्बुध्न्य, पितर, विश्वेदेव, चन्द्र, इन्द्राग्नी, अश्वनी कुमार तथा भग हैं । क्रम पूर्ण होने पर पुनः प्रभव संवत से बारह युगी का आरम्भ हो जाता है । नव संवत पर उसके स्वामी कि विधि पूर्वक  अर्चना करने पर उस वर्ष का फल शुभ प्राप्त होता है ।

पंचांग
ऋग्वेद में वर्ष को १२ चंद्रमासों में बांटा गया है। हरेक तीसरे वर्ष चन्द्र और सौर वर्ष का तालमेल बिठाने के लिए एक अधिक मास जोड़ा गया। इसे मलमास भी कहा जाता है। इसी तरह प्रश्न व्याकरण में १२ महीनों की तरह १२ पूर्णमासी और अमावस्याओं के नाम और उनके फल बताए गए हैं। ऐत्तरेय ब्राह्मण में पांच प्रकार की ऋतुओं का वर्णन है।


प्रथम वर्ष के सौर मास का आरंभ शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को और आगे आने वाले तीसरे वर्ष में सौर मास का आरंभ कृष्ण पक्ष की अष्टमी से होता था। तैत्तिरीय संहिता में सूर्य के छह माह उत्तरायण और छह माह दक्षिणायन रहने की स्थिति का भी उल्लेख है। दरअसल जम्बू द्वीप के बीच में सुमेरू पर्वत है. सूर्य और चन्द्रमा समेत सभी ज्योर्तिमंडल इसकी परिक्रमा करते हैं। सूर्य जम्बूद्वीप के अंतिम आभ्यातंर मार्ग से बाहर निकलता हुआ लवण समुद्र की ओर जाता है, तो इस काल को दक्षिणायन और जब लवण समुद्र के अंतिम मार्ग से भ्रमण करता हुआ जम्बूद्वीप की ओर कूच करता है, तो उत्तरायण कहते हैं।

हिंदी मास या विक्रम संवत में चैत्र और वैशाख को मधुमास कहा गया है. इस दौरान चैत्र शुक्ल प्रतिपदा यानी गुड़ी पड़वा से नया संवत्सर प्रारंभ होता है।

जबकि ग्रेगेरियन में नए साल की शुरूआत पौष अर्थात जनवरी से होती है। विक्रम संवत की उपयोगिता ऋतुओं से जुड़ी थी, इसलिए वह ऋग्वैदिक काल से ही जनसामान्य में प्रचलन में थी। फिर भी हमने शक को राष्ट्रीय संवत के रूप में स्वीकारा।

इस क्रम में यह न भूलें कि शक विदेशी होने के साथ आक्रांता थे और चंद्रगुप्त द्वितीय ने उन्हें उज्जैन में परास्त किया और विक्रमादित्य की उपाधि धारण की। यह घटना ईस्वी सन से 57 साल पहले घटी और विक्रमादित्य ने इसी दिन से विक्रम संवत की शुरुआत की। इन्हीं शकों की एक लड़ाकू टुकड़ी को कनिष्क ने मगध और पाटलिपुत्र में ईसा सन के 78 साल बाद परास्त कर शक संवत की शुरुआत की।

मंगलवार, 3 मार्च 2015

coconut (श्रीफल)

नारियल को संस्कृत भाषा में श्रीफल कहा गया है, श्री का अर्थ होता है "लक्ष्मी" माता लक्ष्मी के बिना कोई भी शुभ कार्य नहीं होता इसलिए, शुभ कार्यों में नारियलावश्य रखा जाता है । ऐसी मान्यता है कि इससे शुभ कार्य में बाधा नहीं आती ।

नारियल ऊपर से सख्त आवरण से ढ़का होता है इसलिए बाहरी प्रदूषण का इस पर असर नहीं होता है, यह अंदर से निर्मल और पवित्र होता है । इसके अंदर जल भरा होता है, ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सफेद और जल बाले स्थान पर चन्द्र का बास होता है, चन्द्रमा मन का कारक  ग्रह है । यजु़र्वेद के पुरुष सूक्त में भी- "चन्द्रमा मनसो जातश​:"  आया है, किसी कार्य में सफलता के लिए मन का शान्त होना जरूरी है ।

वास्तुशास्त्र के अनुसार जलीय जीवों  एवं जल युक्त वस्तुओं से वास्तु दोष दूर होता है । नारियल की शिखाओं में सकारात्मक उर्जा का भण्डार पाया जाता है, इन कारणों से शुभ कार्यों में नारियल कलश पर रख कर उसकी पूजा की जाती है, जल के देवता वरुण हैं और नारियल, कलश भी जलयुक्त होता है, अत​: उसमें वरुण की पूजा भी की जाती है । पूजा के बाद कलश के जल से भक्तों को अभिषिक्त कर आचार्य आशिर्वाद देते हैं ।