बुधवार, 13 मई 2015

Part-3 वास्तु विज्ञान​ (Architectural Science)

चतुर्दश फल प्राप्ति रसल्लोकश्च भवेद ध्रुवम​। 
शिल्पशस्त्र परिज्ञानान्मत्योश्पि सुरतां ब्रजेत​॥
अर्थात- वास्तु शास्त्र के संपूर्ण ज्ञान से चारों फल धर्म, अर्थ​, काम और मोक्ष की प्राप्ती है । यही मानव के लक्ष्य हैं।
भवन निर्माण: 
पर गेहे कृतास्सर्वा:, श्रौता स्मार्त क्रियाश्शुमा:। 
निष्फलास्सुर्य तस्ताहि, भूमीश​: पल मशनुते:॥

मानव के रहने के लिए, सिर छुपाने के लिए एक आवास की आवश्यकता होती है। जिस भूमि पर आवास बनाया जाता है अथवा जिस भूखंड पर निर्मित आवास मनुष्य अपने रहने के लिए किराए पर लेता है वही आवास की संज्ञा में आता है। आवास में कराए ग​ए मांगलिक कार्यों का फल ही व्यक्ति को प्राप्त होता है। ऐसा शास्त्रों का कथन है।

वास्तु नियमों के अंतर्गत जब हम भूखंड का चयन भवन निर्माण के लिए कर लेते हैं तो सर्वप्रथम भूखंड की सही दिशा का निर्धारण चुंबकीय कंपास से आवश्यक होता है- पूर्व​-पश्चिम एरां उत्तर​-दक्षिण निर्माण योजना के लिए नक्शे पर अंकित करें एवं इसी अनुसार भवन निर्माण को सुनिश्चित करें ।

इसके बाद भवन निर्माण योजना चारों दिशाओं में से किसी भी एक दिशा के लिए नियोजित कर सकते हैं । इसको भवन दिशा या भवन आकृति कहते हैं । विभिन्न दिशाओं के भवनों का अपना-अपना महत्व व प्रभाव होता है । 

पूर्व मुखी भवन सुख प्रदान करता है, पश्चिम मुखी भवन भौतिक सुख एवं संपदा प्रदान करता है। उत्तर मुखी भवन संपदा प्रदान करता है । मोक्ष की इच्छा वालों के लिए दक्षिण मुखी भवन अच्छा होता है । इसके बाद सबसे महत्वपूर्ण होता है, आयाति गणना से भवन की लंबाई, चौड़ाई तय करना । वास्तु नियमों में वास्तु का शुभ नक्षत्र एवं गृहिणी, गृहस्वामी एवं पुत्र नक्षत्र अनुकूल होने से, 100 वर्षों तक भवन उत्त्म स्वास्थ्य व सुख​-शान्ति उपलब्ध कराता है । भवन में गृहिणी को गृहस्वामिनी माना गया है क्योंकि गृह की सारी व्यवस्थाएँ उसे ही करनी होती हैं। अत​: गृहस्वामिनी का जन्म नक्षत्र सर्वोपरि होता है । 

भवन निर्माण योजना से पृथ्वी ऊर्जा, अंतरिक्ष ऊर्जा, वातावरण में व्याप्त ऊर्जा, सूर्य ऊर्जा तथा विद्युत चुंबकीय ऊर्जा का अनुकूल प्रभाव प्राप्त होता है । भवन के अंदर जो रिक्त स्थान है वास्तव में ऊर्जा से भरा हुआ है और जब उसे विशेष दिशा से प्रवाहित करते हैं तो परिणामस्वरूप यह ऊर्जा प्रवाह का एक मार्ग बन जाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वातावरण में ऊर्जा का प्रवाह एक निश्चित दिशा से संचालित होता है और जब इस स्थाई ऊर्जा प्रवाह को भवन में उचित ऊर्जा प्रवाह का मार्ग उपलब्ध हो जाता है तभी वास्तु नियमों का अनुकूल प्रभाव प्राप्त होता है ।



शनिवार, 9 मई 2015

भगवान का तृतीय अवतार देवर्षी नारदजी


देवर्षि नारद, श्रीमद्भागवत पुराणानुसार ब्रह्मा के दस मानस पुत्रों में से एक हैं । उन्होंने कठिन तपस्या से ब्रह्मर्षि पद प्राप्त किया है। भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों में से एक माने जाते है।

देवर्षि नारद धर्म के प्रचार तथा लोक-कल्याण हेतु सदैव प्रयत्नशील रहते हैं। शास्त्रों में इन्हें भगवान का मन कहा गया है। इसी कारण सभी युगों में, सब लोकों में, समस्त विद्याओं में, समाज के सभी वर्गो में नारदजी का सदा से प्रवेश रहा है। मात्र देवताओं ने ही नहीं, वरन दानवों ने भी उन्हें सदैव आदर दिया है। समय-समय पर सभी ने उनसे परामर्श लिया है। श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय के २६वें श्लोक में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने इनकी महत्ता को स्वीकार करते हुए कहा है - ‪‎देवर्षीणाम्चनारद‬:। देवर्षियों में मैं नारद हूं। श्रीमद्भागवत महापुराण का कथन है, सृष्टि में भगवान ने देवर्षि नारद के रूप में तीसरा अवतार ग्रहण किया और सात्वततंत्र (जिसे नारद-पाञ्चरात्र कहते हैं) का उपदेश दिया जिसमें सत्कर्मो के द्वारा भव-बंधन से मुक्ति का मार्ग दिखाया गया है।

देवर्षि नारदजी ने कठिन तपस्या से ब्रह्मर्षि पद प्राप्त किया है । देवर्षि नारद धर्म के प्रचार तथा लोक-कल्याण हेतु सदैव प्रयत्नशील रहते हैं। शास्त्रों में इन्हें भगवान का मन कहा गया है। इसी कारण सभी युगों में, सब लोकों में, समस्त विद्याओं में, समाज के सभी वर्गो में नारदजी का सदा से प्रवेश रहा है। मात्र देवताओं ने ही नहीं, वरन दानवों ने भी उन्हें सदैव आदर दिया है। समय-समय पर सभी ने उनसे परामर्श लिया है।

टेलीवीज़न जैसे मनोरंजक साधनो में देवर्षी नारद जी के चरित्र बहुत ही अपमान किया है, इन्हें एक हास्य और चुगली करने वाला पात्र बताया गया है । जबकी यह पूर्णरूप से मिथ्या है । "नारं ज्ञानं ददाति इति नारद" नारदजी ज्ञान के दाता ही नहीं मुक्ती का मार्ग प्रसस्त कराने में जीव की सहाता भी करते हैं, चाहे वह कंश हो ध्रुव या प्रह्लाद, नारद जी ने रामायण के रचयिता वालमील जी का भी कल्याण किया ।

देवर्षि नारद वेद और उपनिषदों के मर्मज्ञ, देवताओं के पूज्य, इतिहास-पुराणों के विशेषज्ञ, पूर्व कल्पों (अतीत) की बातों को जानने वाले, न्याय एवं धर्म के तत्त्वज्ञ, शिक्षा, व्याकरण, आयुर्वेद, ज्योतिष के प्रकाण्ड विद्वान, संगीत-विशारद, प्रभावशाली वक्ता, मेधावी, नीतिज्ञ, कवि, महापण्डित, बृहस्पति जैसे महाविद्वानोंकी शंकाओं का समाधान करने वाले, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष के यथार्थ के ज्ञाता, योगबलसे समस्त लोकों के समाचार जान सकने में समर्थ, सांख्य एवं योग के सम्पूर्ण रहस्य को जानने वाले, देवताओं-दैत्यों को वैराग्य के उपदेशक, कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य में भेद करने में दक्ष, समस्त शास्त्रों में प्रवीण, सद्गुणों के भण्डार, सदाचार के आधार, आनंद के सागर, परम तेजस्वी, सभी विद्याओं में निपुण, सबके हितकारी और सर्वत्र गति वाले हैं।

भगवान की अधिकांश लीलाओं में नारदजी उनके अनन्य सहयोगी बने हैं। वे भगवान के पार्षद होने के साथ देवताओं के प्रवक्ता भी हैं। नारदजी वस्तुत: सही मायनों में देवर्षि हैं।

धर्म ग्रंथों के अनुसार ज्येष्ठ मास के प्रथम दिन देवर्षि नारद का पूजन किया जाता है। इस दिन नारद जयंती भी मनाई जाती है। इस बार नारद जयंती 5 मई, 2015

शुक्रवार, 8 मई 2015

भगवान का द्वितीय अवतार भगवान श्रीवाराह


भगवान का द्वितीय अवतार भगवान श्रीवाराह के रूप में होता है । पहले पोष्ट में यह जानकारी दे चुके हैं कि जय और विजय को श्रीसनतकुमारों ने श्राप दिया । जिस कारण वे पृथ्वी पर दैत्य रुप में जन्म लेकर देवताओं ऋषियों और मनुष्यों पर अत्याचार करने लगे । जय विजय का पहला जन्म हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु के रूप में हुआ । हिरण्याक्ष का मतलब है हिरण्य अर्थात स्वर्ण (सोना), अक्ष का मतलब आँख अर्थात दूसरों के धन सम्पत्ती पर जिसकी नजर हो वही तो हिरण्याक्ष है।

हिरण्याक्ष लोभ का प्रतीक माना गया है । यही कारण है कि वह लोभ के बस हो पृथ्वी का हरण कर समुद्र के कीचड़ में लेजाकर छिपा दिया । यहां जब ब्रह्मा जी ने मनु महराज और देवी सतरूपा को सृष्टी विस्तार के लिए प्रकट किया तब महराज मनु ने अपने दाम्पत्य सुख को भोगने व अपनी संतानों के रहने के लिए एक स्थान देने के लिए बोले, तब ब्रह्माजी ने विचार किया की मैंने जिस धरा का निर्माण किया था, उसे हिरण्याक्ष ने रसातल में छिपा रखा है अब उसे बाहर कैसे लाया जाय, इसी चिन्ता से पीड़ित हो ब्रह्माजी ने भगवान नारायण को स्मरण किया । तब भगवान नारयण की ही प्रेरणा से ब्रह्माजी की नासिका क्षिद्र से श्रीवाराह प्रकट हुए ।

शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किये चतुर भुज रूप में अपने स्वरूप को विराट किया और रसातल से पृथ्वी को निकाल कर अकाश में स्थपित किया । यहाँ पर बहुत से लोग परेशान हो जाते हैं की भगवान को यह रूप धारण करने की क्या आवश्यकता थी, वे और भी अन्य सुन्दर स्वरूप धारण कर सकते थे?

दरासल बात यह है कि जब हम किसी भवन का निर्माण कराते हैं तो उसके लिये अलग-अलग कारीगरों की आवश्यकता पड़ती है । लकड़ी बाला लकड़ी का काम करेगा, लोहे बाला लोहे का काम करेगा, आदि उसी प्रकार इस समस्त सृष्टी को बनाने का दायित्व ब्रह्माजी का है पर कुछ कार्य ऐसे हैं जो वे स्वयं नहीं कर सकते थे और न ही कोई और इसीलिए दूसरे कारीगर को प्रकट किया गया और वे अपना कार्य कर अपने धाम चले गये । अब इसमें आश्चर्य कैसा?

परमात्मा बड़े दयालू हैं, पिता अपने पुत्र की खुशी के लिए घोड़ बनता है और उसे अपनी पीठ पर बैठाकर घोड़े की भांति चलता है, तो हमारा परमपिता अपनी संतान की खुशी के लिए यदि वाराह बनता है तो आश्चर्य क्यों?

एक बात और यह की परमात्मा ने जिस जीव का स्वरूप धारण किया उसकी यह खाशियत है की वह कीचड़ से अपने योग्य वस्तु को खोज निकाले उसकी नासिका कीचड़ में भी स्ववस्तु को शूँघ लेती है । उस रसातल के कीचड़ में वे श्रीराम या श्रीकृष्ण का स्वरूप धारण कर नहीं जा सकते । जिस कार्य के लिए जिस स्वरूप की आवश्यकता थी उन्होंने धारन किया, हमें उनकी इस लीला पर आश्चर्य नहीं करना चाहिए ।

इस प्रकार श्रीवाराह रसातल से पृथ्वी को निकाल कर आकास में स्थापित किया कि उसी समय हिरण्याक्ष वहाँ आकर इसका विरोध किया और श्रीवाराह ने उसका वध किया । इस तरह से महराज मनु को पृथ्वी का आधार मिला और वे मैथुन सृष्टी का विस्तर कर पाये ।

सोमवार, 4 मई 2015

Dev parikrama (देव परिक्रमा)



परिक्रमा देव पूजन का खास अंग है। शास्त्रों में माना गया है कि परिक्रमा से पापों का नाश होता है। विज्ञान की नजर से देखें तो शारीरिक ऊर्जा के विकास में परिक्रमा का विशेष महत्व है। भगवान की मूर्ति और मंदिर की परिक्रमा हमेशा दाहिने हाथ से शुरू करना चाहिए क्योंकि प्रतिमाओं में मौजूद सकारात्मक ऊर्जा उत्तर से दक्षिण की ओर प्रवाहित होती है। बाएं हाथ की ओर से परिक्रमा करने पर इस सकारात्मक ऊर्जा से हमारे शरीर का टकराव होता है, जिसके कारण शारीरिक बल कम होता है। जाने-अनजाने की गई उल्टी परिक्रमा हमारे व्यक्तित्व को नुकसान पहुंचाती है। दाहिने का अर्थ दक्षिण भी होता है,इस कारण से परिक्रमा को ‘प्रदक्षिणाऽ भी कहा जाता है।
  • पदमपुराण मेँ हरिपूजा विधि-वर्णन के अंतर्गत कहा गया हे-
हरिप्रदक्षिणे यावत्पदं गतछेत शनैः शनैः । पदमपअश्वमेधस्य फलं प्राप्तनोति मानवः॥115
यावत्पादं नरो भक्त्या गच्छेद्विष्णुप्रदक्षिणे। तावत्कल्पसहस्राणी विष्णुना सह मोदते॥116
प्रदक्षिणाकृत्य सर्व संसारं यत्फलभवेत्। हरि प्रदक्षिणीकृत्य तस्माकोटिगुणं फलम्॥117
--पद्मपुराण ११५-११७
अर्थात भक्तिभाव से जो मनुष्य विष्णु की परिक्रमा करने मेँ धीरे- धीरे जितने भी कदम चलता हे, उसके एक- एक पद के चलने मेँ मनुष्य एक-एक अश्वमेध- यज्ञ करने का फल प्राप्त किया करता हे। जितने कदम प्रदक्षिणा करते हुए भक़्त चलता हे, उतने हीँ सहत्र कल्पो तक भगवान विष्णु के धाम मेँ उनके ही साथ प्रसन्नता से निवास करता हे। संपूर्ण संसार की प्रदक्षिणा करने से जो पुण्य प्राप्त होता हे, उनके भी करोड़ोँ गुना अधिक श्रीहरि की प्रदक्षिणा करने से फल प्राप्त हुआ करता है।
  • इस मंत्र के साथ करें देव परिक्रमा-
यानि कानि च पापानि जन्मांतर कृतानि च। तानि सवार्णि नश्यन्तु प्रदक्षिणे पदे-पदे॥

अर्थ : जाने अनजाने में किए गए और पूर्वजन्मों के भी सारे पाप प्रदक्षिणा के साथ-साथ नष्ट हो जाए। परमेश्वर मुझे सद्बुद्धि प्रदान करें।
  • परिक्रमा बाँयी या दाँयी
शास्त्रों में भगवान शंकर की परिक्रमा करते समय अभिषेक की धार को न लांघने का विधान बताया गया है। इसलिए उनकी पूरी परिक्रमा न करके आधी ही की जाती है ओर आधी वापस उसी तरफ लोटकर की जाती है। मान्यता यह है कि शंकर भगवान की तेज के लहरों की गतियाँ बाई और दाई दोनों ओर होती है।

उलटी यानी विपरीत वामवर्ती (बाई हाथ की तरफ से) परिक्रमा करने से देवी शक्ति के ज्योतिर्मंडल की गति और हमारे अंदर विद्यमान दिव्यपरमाणुओ में टकराव पैदा होता है। परिणाम स्वरुप हमारा तेज नष्ट हो जाता है। इसलिए वामवर्ती परिक्रमा को वर्जित किया जाता है। इसे पाप स्वरुप बताया गया है।
  • पंचदेव परिक्रमा
सूर्य देव की सात, श्रीगणेश की चार, श्री विष्णु की पांच, श्री दुर्गा की एक, श्री शिव की आधी प्रदक्षिणा करें। शिव की मात्र आधी ही प्रदक्षिणा की जाती है,जिसके विशेष में मान्यता है कि जलधारी का उल्लंघन नहीं किया जाता है। जलधारी तक पंहुचकर परिक्रमा को पूर्ण मान लिया जाता है।
  • इस तरह भी कर सकते हैं प्रदक्षिणा
प्रदक्षिणा में आमतौर किसी भी देवमूर्ति के चारों ओर घूमकर की जाती है लेकिन कभी -कभी देवमूर्ति की पीठ दीवार की ओर रहने से प्रदक्षिणा के लिए फेरे लेने को पर्याप्त जगह नहीं होती है। घरों में भी पूजन करते समय देवमूर्ति की स्थापना किसी दीवार के सहारे से ही की जाती है। ऐसा होने पर देवमूर्ति के समक्ष यानी कि सामने भी गोल घूमकर प्रदक्षिणा की जा सकती है।
  • परिक्रमा के साथ जरुरी है श्रद्धा
पूजन के किसी भी प्रकार में श्रद्धा जरुरी है। बगैर श्रद्धा के परिक्रमा भी निष्फल ही जाती है क्योंकि यह श्रद्धा का ही चमत्कार था जिसके बल पर श्रीगणेश ने पूरे ब्रह्मांड को शिव और शक्ति का रूप मानकर अपने माता-पिता की ही परिक्रमा की और स्वयं माता -पिता ने ही उन्हें सबसे पहले पूूजे जाने का आशीर्वाद प्रदान किया।
  • वृक्षों की परिक्रमा
महिलाओं द्वारा वटवृक्ष की परिक्रमा करना सौभाग्य का सूचक है। सोमवती अमावश्या में महिलाएँ तुलसी के पौधे को सामने रख गोपाल (श्रीकृष्ण​) की लौकिक पूजा कर तुलसी की परिक्रमा करती हैं यह पौराणिक परम्परा बतायी जा रही है । ऐसा करने से परिवार में सुख समृद्धि का आगमन होता है, परिवार रोग वाधाओं से मुक्त होता है ।

गुरुवार, 30 अप्रैल 2015

भगवान का प्रथम अवतार सनकादि मुनि.

"परमात्मा" जो निराकार हैं उन्होंने लीलार्थ 24 तत्वों के अण्ड का निर्माण किया। उस अण्ड से ही वे परमात्मा साकार रूप में बाहर निकले। उन्होंने जल की रचना की तथा हजारों दिव्य वर्षों तक उसी जल में शयन किया अतः उनका नाम नारायण हुआ। नार को जल भी कहते हैं । और जल में निरन्तर शयन करने वाले नारायण ।

आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः।  
अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः॥
उन्हें जब बहु होने की इच्छा हुई तब वे जल से उठे तथा अण्ड के अधिभूत, अध्यात्म तथा अधिदैव ये तीन खण्ड किये। उन परमात्मा के आंतरिक आकाश से इन्द्रिय, मनः तथा देह शक्ति उत्पन्न हुई। साथ ही सूत्र, महान तथा असु नामक तीन प्राण भी उत्पन्न हुए। उनके खाने की इच्छा के कारण अण्ड से मुख निकला जिसके अधिदैव वरुण तथा विषय रसास्वादन हुआ। इसी प्रकार बोलने की इच्छा के कारण वाक इन्द्रिय हुई जिसके देव अग्नि तथा भाषण विषय हुआ। उसी तरह नासिका, नेत्र, कर्ण, चर्म, कर, पाद आदि निकला। यह परमात्मा का साकार स्थूल रूप है जिनका नमन वेद ‪"पुरुष सूक्त‬" से किये हैं। प्रलय काल में भगवान शेष पर शयन कर रहे थे।

वे ‪आदिमध्यान्तहीनाय निर्गुणाय गुणात्मने‬ हैं अतः शेष जो सबके बाद भी रहते हैं वही उनकी शैया हैं। सृष्टि की इच्छा से जब उन्होंने आँखें खोलीं तो देखा कि सम्पूर्ण लोक उनमें लीन है। तभी रजोगुण से प्रेरित परमात्मा की नाभि से कमल अंकुरित हुआ जिससे सम्पूर्ण जल प्रकाशमय हो गया। नाभिपद्म से उत्पन्न ब्रह्मा पंकजकर्णिका पर आसीन थे। ब्रह्मा जी ने सोंचा कि मैं कौन, क्यों हूँ तथा मेरे जनक कौन हैं? वे कमलनाल के सहारे जल में प्रविष्ट हुए तथा सौं वर्ष तक निरंतर खोज करने पर भी कोई प्राप्त नहीं हुआ। अंत में वे पुनः यथास्थान बैठ गए। वहाँ हजारों वर्षों तक समाधिस्थ रहे। तभी उन्हें पुरुषोत्तम परमात्मा के दर्शन हुए। शेषनाग में शयन कर रहे प्रभु का नीलमणि के समान देह अनेक आभूषणों से आच्छादित था तथा वन माला और कौस्तुभ मणि स्वयं को भाग्यवान मान रहे थे। उनके अंदर ब्रह्मा जी ने अथाह सागर तथा कमल पर आसीन स्वयं को भी देखा। ब्रह्मा जी भगवान की स्तुति करते हैं -
ज्ञातोऽसि मेऽद्य सुचिरान्ननु देहभाजां,
न ज्ञायते भगवतो गतिरित्यवद्यम्।
नान्यत्वदस्ति भगवन्नपि तन्न शुद्धं,
मायागुणव्यतिकराद्यदुरुर्विभासी॥ ” भागवत

"चिरकाल से मैं आपसे अंजान था, आज आपके दर्शन हो गए। मैने आपको जानने का प्रयास नहीं किया, यही हम सब का सबसे बड़ा दोष है क्योंकि समस्त ब्रह्माण्ड में आप ही जानने योग्य हैं। अपने समीपस्थ जीवों के कल्याणार्थ आपने सगुण रूप धारण किया जिससे मेरी उत्पत्ति हुई। निर्गुण भी इससे भिन्न नहीं।" श्री भगवान ने कहा "मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, जाओ सृष्टि करो। प्रलय से जो प्रजा मुझमें लीन हो गई उसकी पुनः उत्पत्ति करो।" और भगवान अंतर्धान हो गए। ब्रह्मा जी ने सौ वर्षों तक तपस्या की। उस समय प्रलयकालीन वायु के द्वारा जल तथा कमल दोनो आंदोलित हो उठे। ब्रह्मा जी ने तप की शक्ति से उस वायु को जल सहित पी लिया। तब आकाशव्यापी कमल से ही चौदह लोकों की रचना हुई। ईश्वर काल के द्वारा ही सृष्टि किया करते हैं अतः काल की सृष्टि दस प्रकार की होती है -
1. महत्तत्व, 2. अहंकार, 3. तन्मात्राएँ, 4. इन्द्रियाँ, 5. इन्द्रियों के अधिष्ठाता देवता
6. पञ्चपर्वा अविद्या (तम, मोह, महामोह, तामिस्र, अन्धतामिस्र), 7. उपर उक्त छः सृष्टियाँ प्राकृतिक सर्ग कहलाते हैं। 8. स्थावर, 9. तिर्यक्, 10. मनुष्य 
ये वैकृतिक सर्ग कहलाती है।
इन सृष्टियों से ब्रह्मा जी को संतुष्टि न मिली तब उन्होंने मन में नारायण का ध्यान कर मन से दशम सृष्टि सनकादि मुनियों की थी जो साक्षात भगवान ही थे। ये सनकादि चार सनत, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार नामक महर्षि हैं तथा इनकी आयु सदैव पाँच वर्ष की रहती है। ब्रह्मा जी नें उन बालकों से कहा कि पुत्र जाओ सृष्टि करो। सनकादि मुनियों नें ब्रह्मा जी से कहा "पिताश्री! क्षमा करें। हमारे हेतु यह माया तो अप्रत्यक्ष है, हम भगवान की उपासना से बड़ा किसी वस्तु को नहीं मानते अतः हम भई जाकर उन्हीं की भक्ति करेंगे।" और सनकादि मुनि वहाँ से चल पड़े। वे वहीं जाया करते हैं जहाँ परमात्मा का भजन होता है। नारद जी को इन्होंने भागवत सुनाया था तथा ये स्वयं भगवान शेष से भागवत श्रवण किये थे। ये जितने छोटे दिखते हैं उतनी ही विद्याकंज हैं। ये चारो वेदों के ही रूप कहे जा सकते हैं।

जय विजय को श्राप:
एक समय चारों सनकादि कुमार भगवान विष्णु के दर्शनार्थ वैकुण्ठ जा पहुंचे। वे वहाँ के सौंदर्य को देखकर बड़े प्रसन्न हुए। वहाँ स्फटिक मणि के स्तंभ थे, भूमि पर भी अनेकों मणियाँ जड़ित थीं। भगवान के सभी पार्षद नन्द, सुगन्ध सहित वैकुण्ठ के पति का सदैव गुणगान किया करते हैं। चारों मुनि छः ड्योढ़ियाँ लाँघकर जैसे ही सातवीं ड्योढ़ी पर चढ़े उनका दृष्टिपात दो महाबलशाली द्वारपाल जय तथा विजय पर हुआ। कुमार जैसे ही आगे बढ़े दोनों द्वारपालों ने मुनियों को धृष्टतापूर्वक रोक दिया। यद्यपि वे रोकने योग्य न थे इसपर सदा शांत रहने वाले सनकादि मुनियों को भगवत इच्छा से क्रोध आ गया। वे द्वारपालों से बोले "अरे! बड़ा आश्चर्य है। वैकुण्ठ के निवासी होकर भी तुम्हारा विषम स्वभाव नहीं समाप्त हुआ? तुम लोग तो सर्पों के समान हो। तुम यहाँ रहने योग्य नहीं अतः तुम नीचे लोक में जाओ। तुम्हारा पतन हो जाये।" इसपर दोनो द्वारपाल मुनियों के चरणों पर गिर पड़े। तभी भगवान का आगमन हुआ। मुनियों नें भगवान को प्रणाम किया। श्री भगवान कहते हैं "हे ब्रह्मन्! ब्राह्मण सदैव मेरे आराध्य हैं। मैं आपसे मेरे द्वारपालों द्वारा अनुचित व्यवहार हेतु क्षमा प्रार्थी हूँ।" उन्होंने द्वारपालों से कहा "यद्यपि मैं इस श्राप को समाप्त कर सकता हूँ परंतु मैं ऐसा नहीं करुंगा क्योंकि तुम लोगों को ये श्राप मेरी इच्छा से ही प्राप्त हुआ है। तुम लोग इसके ताप से तपकर ही चमकोगे, यह परीक्षा है इसे ग्रहण करो। एक बात और... तुम मेरे बड़े प्रिय हो।" द्वारपालों ने श्राप को ग्रहण किया। मुनियों ने कहा "प्रभु! आप तो हमारे भी स्वामी हैं और सब ब्राह्मणों का आदर करते हुए सभी लोग मुक्ति को प्राप्त करें यह सोचकर हमें आदर प्रदान करते हैं। प्रभु आप धन्य हैं। सदैव हमारे हृदय में वास करें। और द्वारपालों की मुक्ति आपके करकमलों से ही होगी" भगवान ने द्वारपालों को कहा "द्वारपालों तुम तीन जन्म तक राक्षस योनि में जाओगे तथा मैं तुम्हारा उद्धार करुंगा।" इसी श्राप के कारण ये दोनों द्वारपाल तीन जन्मों तक राक्षस बने। प्रथम जन्म में ये दोनों ही हिरण्याक्ष तथा हिरण्यकश्यपु बनें, द्वितीय में रावण तथा कुम्भकर्ण तथा तृतीय जन्म में ये ही शिशुपाल तथा दन्तवक्र बने।
__Bagavat Mahapuran

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2015

What is Yagna ''यज्ञ क्या है''

यज्ञ का अर्थ है- शुभ कर्म। श्रेष्ठ कर्म। सतकर्म। वेदसम्मत कर्म।
सकारात्मक भाव से ईश्वरीय-प्रकृति तत्व से किए गए आवाहन से जीवन की प्रत्येक इच्छा पूरी होती है ।
यज्ञ 5 प्रकार के होते है : 
(1) ब्रह्मयज्ञ, (2) देवयज्ञ, (3) पितृयज्ञ, (4) वैश्वदेवयज्ञ, (5) अतिथि यज्ञ ।

(1) ब्रह्मयज्ञ : जड़ और प्राणी जगत से बढ़कर है मनुष्य । मनुष्य से बढ़कर है पितर, अर्थात माता-पिता और आचार्य । पितरों से बढ़कर हैं देव, अर्थात प्रकृति की पाँच शक्तियाँ और देव से बढ़कर है- ईश्वर और हमारे ऋषिगण । ईश्वर अर्थात ब्रह्म। यह ब्रह्म यज्ञ संपन्न होता है नित्य संध्या वंदन, स्वाध्याय तथा वेदपाठ करने से । इसके करने से मनुष्य ऋषि से उऋण हो जाता है । इससे ब्रह्मचर्य आश्रम का जीवन भी पुष्ट होता है।

(2) देवयज्ञ : देवयज्ञ जो सत्संग तथा अग्निहोत्र कर्म से सम्पन्न होता है। इसके लिए वेदी में अग्नि जलाकर होम किया जाता है यही अग्निहोत्र यज्ञ है। यह भी संधिकाल में गायत्री छंद के साथ किया जाता है। इसे करने के नियम हैं । इस ‘देव ऋण’ से मनुष्य उऋण हो जाता है । हवन करने को ‘देवयज्ञ’ कहा जाता है। हवन में सात पेड़ों की समिधाएँ (लकड़ियाँ) सबसे उपयुक्त होतीं हैं- आम, बड़, पीपल, ढाक, जाँटी, जामुन और शमी। हवन से शुद्धता और सकारात्मकता बढ़ती है। रोग और शोक मिटते हैं। इससे गृहस्थ जीवन पुष्ट होता है।

(3) पितृयज्ञ : सत्य और श्रद्धा से किए गए कर्म श्राद्ध और जिस कर्म से माता-पिता और आचार्य तृप्त हो वह तर्पण है। वेदानुसार यह श्राद्ध-तर्पण हमारे पूर्वजों, माता-पिता और आचार्य के प्रति सम्मान का भाव है। यह यज्ञ सम्पन्न होता है सन्तानोत्पत्ति से। इस ‘पितृ ऋण’ भी से मनुष्य उऋण हो जाता है ।

(4) वैश्वदेवयज्ञ : इसे भूत यज्ञ भी कहते हैं। पंच महाभूत से ही मानव शरीर है। सभी प्राणियों तथा वृक्षों के प्रति करुणा और कर्तव्य समझना उन्हें अन्न-जल देना ही भूत यज्ञ या वैश्वदेव यज्ञ कहलाता है। अर्थात जो कुछ भी भोजन कक्ष में भोजनार्थ सिद्ध हो उसका कुछ अंश उसी अग्नि में होम करें जिससे भोजन पकाया गया है। फिर कुछ अंश गाय, कुत्ते और कौवे को दें। ऐसा वेद- पुराण कहते हैं।

(5) अतिथि यज्ञ : अतिथि से अर्थ मेहमानों की सेवा करना उन्हें अन्न-जल देना। अपंग, महिला, विद्य संन्यासी, चिकित्सक और धर्म के रक्षकों की सेवा- सहायता करना ही अतिथि यज्ञ है। इससे संन्यास आश्रम पुष्ट होता है। यही पुण्य है। यही सामाजिक कर्तव्य है।

गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

Shell (शंख​)

शंख का एक अपना महत्त्व:
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धार्मिक अनुष्ठानों में शंख का एक अपना महत्त्व है, पूजा-पाठ में शंख बजाने का चलन युगों-युगों से है । देश के कई भागों में लोग शंख को पूजाघर में रखते हैं और इसे नियमित रूप से बजाते हैं। ऐसे में यह उत्सुकता एकदम स्वाभाविक है कि शंख केवल पूजा-अर्चना में ही उपयोगी है या इसका सीधे तौर पर कुछ लाभ भी है। शंख रखने, बजाने व इसके जल का उचित इस्तेमाल करने से कई तरह के लाभ होते हैं। कई फायदे तो सीधे तौर पर सेहत से जुड़े हैं।

धार्मिक ग्रंथों में शंख को माता लक्ष्मी का भाई बताया गया है, क्योंकि माता लक्ष्मी की तरह शंख भी सागर से ही उत्पन्न हुआ है। शंख की गिनती समुद्र मंथन से निकले चौदह रत्नों में होती है। ऐसी मान्यता है कि जिस घर में शंख होता है, वहां लक्ष्मी का वास होता है, शंख को इसलिए भी शुभ माना गया है, क्योंकि माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु, दोनों ही अपने हाथों में इसे धारण करते हैं ।

ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है कि शंख में जल रखने और इसे छिड़कने से वातावरण शुद्ध होता है। पूजा-पाठ में शंख बजाने से वातावरण पवित्र होता है. जहां तक इसकी आवाज जाती है, इसे सुनकर लोगों के मन में सकारात्मक विचार पैदा होते हैं। अच्छे विचारों का फल भी स्वाभाविक रूप से बेहतर ही होता है।शंख की आवाज लोगों को पूजा-अर्चना के लिए प्रेरित करती है। ऐसी मान्यता है कि शंख की पूजा से कामनाएं पूरी होती हैं। इससे दुष्ट आत्माएं पास नहीं भटकती हैं।

आयुर्वेद, विज्ञान और वास्तु:
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वैज्ञानिकों का मानना है कि शंख की आवाज से वातावरण में मौजूद कई तरह के जीवाणुओं-कीटाणुओं का नाश हो जाता है। कई टेस्ट से इस तरह के नतीजे मिले हैं। आयुर्वेद के मुताबिक, शंखोदक के भस्म के उपयोग से पेट की बीमारियां, पथरी, पीलिया आदि कई तरह की बीमारियां दूर होती हैं। हालांकि इसका उपयोग एक्सपर्ट वैद्य की सलाह से ही किया जाना चाहिए।

शंख बजाने से फेफड़े का व्यायाम होता है, पुराणों के अनुसार अगर श्वास का रोगी नियमित तौर पर शंख बजाए, तो वह बीमारी से मुक्त हो सकता है के 
शंख में रखे पानी का सेवन करने से हड्डियां मजबूत होती हैं। यह दांतों के लिए भी लाभदायक है। शंख में कैल्शियम, फास्फोरस व गंधक के गुण होने की वजह से यह फायदेमंद है। वास्तुशास्त्र के मुताबिक भी शंख में ऐसे कई गुण होते हैं, जिससे घर में पॉजिटिव एनर्जी आती है। शंख की आवाज से सोई हुई भूमि जाग्रत होकर शुभ फल देती है।

शंख के प्रकार:
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शंख मुख्य रूप से दो हैं १.दक्षिणावर्ती २.वामवर्ती, मंदिर में रखे जाने वाले शंख उल्टे हाथ के तरफ खुलते हैं और बाजार में आसानी से मिल जाते हैं, यह वामवर्ती शंख है। जबकि दक्षिणावर्ती शंख सीधे हाथ के तरफ खुलते हैं और बहुत चमत्कारी होते हैं और बहुत ही मुश्किल से मिल पाते हैं। दक्षिणावर्ती शंख एक दुर्लभ वस्तु है। ये आसानी से नहीं मिल पाता है क्योंकि दक्षिणावर्ती शंख को लक्ष्मी का स्वरुप माना जाता है।

इसलिए ही ज्योतिष में बताया गया है कि दक्षिणावर्ती शंख घर में होने पर लक्ष्मी का घर में वास रहता है। तंत्र शास्त्र ने सीधे हाथ की तरफ खुलने वाले शंख को यदि पूर्ण विधि-विधान के साथ लाल कपड़े में लपेटकर अपने घर में अलग-अलग स्थान पर रखें तो हर तरह की परेशानियों का हल हो सकता है। इसलिए घर में शंख रखा जाना शुभ माना जाता है। वर्तमान समय में वास्तु-दोष के निवारण के लिए जिन चीजों का प्रयोग किया जाता है, उनमें से यदि दक्षिणावर्ती शंख का उपयोग किया जाए तो कई प्रकार के लाभ हो सकते हैं। इससे आरोग्य वृद्धि, आयुष्य प्राप्ति, लक्ष्मी प्राप्ति, पुत्र प्राप्ति, पितृ-दोष शांति, विवाह में विलंब जैसे अनेक दोष दूर होते हैं। कहते हैं कि जिस घर में नियमित शंख ध्वनि होती है वहां कई तरह के रोगों से मुक्ति मिलती है।

शंख पूजन से श्री समृद्धि आती है यदि इस शंख में दूध भरकर किसी नि:संतान महिला को पिलाया जाए तो उसे जल्द ही संतान सुख की प्राप्ति होती है। इस शंख में रात भर पानी भर कर रखे सुबह मुख पर लगाने से दाग धब्बे व काले निशान हट जाते है। पूजा करने के बाद इस शंख के जल को घर में छिडकने पर घर पर कोई बुरा साया नहीं पड़ता है।