गुरुवार, 16 जुलाई 2015

क्या है विवाह संस्कार​

सद्गृहस्थ की, परिवार निर्माण की जिम्मेदारी उठाने के योग्य शारीरिक, मानसिक परिपक्वता आ जाने पर युवक- युवतियों का विवाह संस्कार कराया जाता है । भारतीय संस्कृति के अनुसार विवाह कोई शारीरिक या सामाजिक अनुबन्ध मात्र नहीं हैं, यहाँ दाम्पत्य को एक श्रेष्ठ आध्यात्मिक साधना का भी रूप दिया गया है । इसलिए कहा गया है "धन्यो गृहस्थाश्रमः" । सद्गृहस्थ ही समाज को अनुकूल व्यवस्था एवं विकास में सहायक होने के साथ श्रेष्ठ नई पीढ़ी बनाने का भी कार्य करते हैं । वहीं अपने संसाधनों से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ एवं संन्यास आश्रमों के साधकों को वाञ्छित सहयोग देते रहते हैं । ऐसे सद्गृहस्थ बनाने के लिए विवाह को रूढ़ियों- कुरीतियों से मुक्त कराकर श्रेष्ठ संस्कार के रूप में पुनः प्रतिष्ठित करना आवश्यक है । युग निर्माण के अन्तर्गत विवाह संस्कार के पारिवारिक एवं सामूहिक प्रयोग सफल और उपयोगी सिद्ध हुए हैं ।

विवाह दो आत्माओं का पवित्र बन्धन है । दो प्राणी अपने अलग- अलग अस्तित्व को समाप्त कर एक सम्मिलित इकाई का निर्माण करते हैं । स्त्री और पुरुष दोनों में परमात्मा ने कुछ विशेषताएँ और कुछ अपूर्णताएँ दे रखी हैं । विवाह  से एक- दूसरे की अपूर्णताओं की अपनी विशेषताओं से पूर्ण करते हैं, इससे समग्र व्यक्तित्व का निर्माण होता है । इसलिए विवाह को सामान्यतया मानव जीवन की एक आवश्यकता माना गया है । एक- दूसरे को अपनी योग्यताओं और भावनाओं का लाभ पहुँचाते हुए गाड़ी में लगे हुए दो पहियों की तरह प्रगति- पथ पर अग्रसर होते जाना विवाह का उद्देश्य है । वासना का दाम्पत्य- जीवन में अत्यन्त तुच्छ और गौण स्थान है, प्रधानतः दो आत्माओं के मिलने से उत्पन्न होने वाली उस महती शक्ति का निर्माण करना है, जो दोनों के लौकिक एवं आध्यात्मिक जीवन के विकास में सहायक सिद्ध हो सके ।

विवाह  के चरण :
1. वर-वरण (तिलक) 2. द्वार पूजा 3. विवाह संस्कार का विशेष कमर्काण्ड 4. कन्या को आशिर्वाद (चढा़व)
5. परस्पर उपहार 6. हस्तपीतकरण 7. कन्यादान - गुप्तदान 8. गोदान 9. पाणिग्रहण 10. ग्रन्थिबन्धन 11. वर-वधू की प्रतिज्ञाएँ 12. ह्रदयालम्भन​ 13. प्रायश्चित होम 14. शिलारोहण 15. लाजाहोम एवं परिक्रमा (भाँवर) 16. सप्तपदी 17. आसन परिवतर्न 18. पाद प्रक्षालन 19. शपथ आश्वासन 20. मंगल तिलक! 

कामिका एकादशी व्रत

श्रावण मास की कृष्ण एकादशी का नाम कामिका है। उसके सुनने मात्र से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। इस वर्ष कामिका एकादशी दिनाँक​ 10th अगस्त 2015 को सोमवार के दिन मनाई जाएगी । कामिका एकादशी विष्णु भगवान की अराधना एवं पूजा का सर्वश्रेष्ठ समय होता है।
व्रत समय :
एकादशी तिथि का प्रारम्भ दिनाँक​ 09th अगस्त 2015 को 16:58 बजे होगा, और एकादशी तिथि की समाप्ति दिनाँक​ 10 th अगस्त 2015 को 16:45 बजे है । 
पारण (व्रत तोड़ने का) समय :
दिनाँक​ 11th को  06:22 से 08:54 तक है । पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय 16:59 तक है ।
कामिका एकादशी पूजा-विधि :
एकादशी के दिन स्नानादि से पवित्र होने के पश्चात संकल्प करके श्रीविष्णु विग्रह का पूजन करना चाहिए। भगवान विष्णु को फूल, फल, तिल, दूध, पंचामृत आदि नाना पदार्थ निवेदित करके, विष्णु जी के नाम का स्मरण एवं कीर्तन करना चाहिए। एकादशी व्रत में ब्राह्मण भोजन एवं दक्षिणा का बड़ा ही महत्व है अत: ब्राह्मण को भोजन करवाकर दक्षिणा सहित विदा करने के पश्चात ही भोजन ग्रहण करें। इस प्रकार जो कामिका एकादशी का व्रत रखता है उसकी कामनाएं पूर्ण होती हैं। 
व्रत का महत्व :
कामिका एकादशी उत्तम फलों को प्रदान करने वाला व्रत है। इस एकादशी के दिन भगवान श्रीविष्णु की पूजा करने से अमोघ फलों की प्राप्ति होती है। इस दिन तीर्थ स्थलों में विशिष स्नान दान करने की प्रथा भी रही है इस एकादशी का फल अश्वमेघ यज्ञ के समान होता है। इस एकादशी का व्रत करने के लिये प्रात: स्नान करके भगवान श्रीविष्णु को भोग लगाना चाहिए। आचमन के पश्चात धूप, दीप, चन्दन आदि पदार्थों से आरती करनी चाहिए।

कामिका एकादशी व्रत के दिन श्री हरि का पूजन करने से व्यक्ति के पितरों के भी कष्ट दूर होते है। व्यक्ति पाप रूपी संसार से उभर कर, मोक्ष की प्राप्ति करने में समर्थ हो पाता है। इस एकादशी के विषय में यह मान्यता है, कि जो मनुष्य़ सावन माह में भगवान विष्णु की पूजा करता है, उसके द्वारा गंधर्वों और नागों की सभी की पूजा हो जाती है। लालमणी मोती, दूर्वा आदि से पूजा होने के बाद भी भगवान श्री विष्णु उतने संतुष्ट नहीं होते, जितने की तुलसी पत्र से पूजा होने के बाद होते है।
इस व्रत में क्या खायें :
चावल व चावल से बनी किसी भी चीज के खाना पूर्णतया वर्जित होता है। व्रत के दूसरे दिन चावल से बनी हुई वस्तुओं का भोग भगवान को लगाकर ग्रहण करना चाहिए। इसमें नमक रहित फलाहार करें। फलाहार भी केवल दो समय ही करें। फलाहार में तुलसी दल का अवश्य ही प्रयोग करना चाहिए। व्रत में पीने वाले पानी में भी तुलसी दल का प्रयोग करना उचित होता है।

शनिवार, 11 जुलाई 2015

पापमोचनी एकादशी

चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को "पापमोचिनी एकादशी" कहते है, अर्थात पाप को नष्ट करने वाली। पापमोचनी एकादशी व्रत व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्त कर उसके लिये मोक्ष के मार्ग खोलती है। इस एकादशी को पापो को नष्ट करने वाली, एकादशी के रुप में भी जाना जाता है।
एकादशी व्रत विधि : 
भविष्योत्तर पुराणानुसार इस व्रत में भगवान विष्णु के चतुर्भुज रूप की पूजा की जाती है। व्रती दशमी तिथि को एक बार सात्विक भोजन करे और मन से भोग विलास की भावना को निकालकर हरि में मन को लगाएं। एकादशी के दिन सूर्योदय काल में स्नान करके व्रत का संकल्प करें। संकल्प के उपरान्त षोड्षोपचार सहित श्री विष्णु की पूजा करें। पूजा के पश्चात भगवान के समक्ष बैठकर भगवत कथा का पाठ अथवा श्रवण करें। एकादशी तिथि को जागरण करने से कई गुणा पुण्य मिलता है। अत: रात्रि में भी निराहार रहकर भजन कीर्तन करते हुए जागरण करें। द्वादशी के दिन प्रात: स्नान करके विष्णु भगवान की पूजा करें। 
कथा:
भगवान श्री कृष्ण,  अर्जुन से कहते हैं- "राजा मान्धाता ने एक समय में लोमश ऋषि से जब पूछा कि प्रभु यह बताएं कि मनुष्य जो जाने अनजाने पाप कर्म करता है, उससे कैसे मुक्त हो सकता है। राजा मान्धाता के इस प्रश्न के जवाब में लोमश ऋषि ने राजा को एक कहानी सुनाई कि चैत्ररथ नामक सुन्दर वन में च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी ऋषि तपस्या में लीन थे। इस वन में एक दिन मंजुघोषा नामक अप्सरा की नज़र ऋषि पर पड़ी तो वह उनपर मोहित हो गयी और उन्हें अपनी ओर आकर्षित करने हेतु यत्न करने लगी। कामदेव भी उस समय उधर से गुजर रहे थे कि उनकी नज़र अप्सरा पर गयी और वह उसकी मनोभावना को समझते हुए उसकी सहायता करने लगे। अप्सरा अपने यत्न में सफल हुई और ऋषि कामपीड़ित हो गये।

काम के वश में होकर ऋषि शिव की तपस्या का व्रत भूल गये और अप्सरा के साथ रमण करने लगे। कई वर्षों के बाद जब उनकी चेतना जगी तो उन्हें एहसास हुआ कि वह शिव की तपस्या से विरत हो चुके हैं। उन्हें तब उस अप्सरा पर बहुत क्रोध हुआ और तपस्या भंग करने का दोषी जानकर ऋषि ने अप्सरा को श्राप दे दिया कि तुम पिशाचिनी बन जाओ। श्राप से दु:खी होकर वह ऋषि के पैरों पर गिर पड़ी और श्राप से मुक्ति के लिए अनुनय करने लगी।

मेधावी ऋषि ने तब उस अप्सरा को विधि सहित चैत्र कृष्ण एकादशी का व्रत करने के लिए कहा। भोग में निमग्न रहने के कारण ऋषि का तेज भी लोप हो गया था। अत: ऋषि ने भी इस एकादशी का व्रत किया, जिससे उनका पाप नष्ट हो गया। उधर अप्सरा भी इस व्रत के प्रभाव से पिशाच योनि से मुक्त हो गयी और उसे सुन्दर रूप प्राप्त हुआ व स्वर्ग के लिए प्रस्थान कर गयी।
महत्व:
पापमोचनी एकादशी के प्रभाव से मनुष्यों के अनेक पाप नष्ट हो जाते है।

शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

विवाह के आठ प्रकार​

प्राचीन भारतीय विद्वानों के अनुसार इस संस्कार के दो प्रमुख उद्देश्य हैं। मनुष्य विवाह करके देवताओं के लिए यज्ञ करने का अधिकारी हो, और पुत्र उत्पन्न कर वंश वृद्धि कर पितृ ऋण से मुक्ती पाना ।

परिवार निर्माण की जिम्मेदारी उठाने के योग्य शारीरिक, मानसिक परिपक्वता आ जाने पर युवक-युवतियों का विवाह संस्कार कराया जाता है। भारतीय संस्कृति के अनुसार विवाह कोई शारीरिक या सामाजिक अनुबन्ध मात्र नहीं हैं, यहाँ दाम्पत्य को एक श्रेष्ठ आध्यात्मिक साधना का भी रूप दिया गया है। इसलिए कहा गया है ऽधन्यो गृहस्थाश्रमःऽ। सद्गृहस्थ ही समाज को अनुकूल व्यवस्था एवं विकास में सहायक होने के साथ श्रेष्ठ नई पीढ़ी बनाने का भी कार्य करते हैं।

विवाह दो आत्माओं का पवित्र बन्धन है। दो प्राणी अपने अलग-अलग अस्तित्वों को समाप्त कर एक सम्मिलित इकाई का निर्माण करते हैं। एक-दूसरे को अपनी योग्यताओं और भावनाओं का लाभ पहुँचाते हुए गाड़ी में लगे हुए दो पहियों की तरह प्रगति-पथ पर अग्रसर होते जाना विवाह का उद्देश्य है। वासना का दाम्पत्य-जीवन में अत्यन्त तुच्छ और गौण स्थान है, प्रधानतः दो आत्माओं के मिलने से उत्पन्न होने वाली उस महती शक्ति का निमार्ण करना है, जो दोनों के लौकिक एवं आध्यात्मिक जीवन के विकास में सहायक सिद्ध हो सके।

परन्तु आज वह समय नहीं रहा, आज सब जाति बन्धन से मुक्त होकर भी विवाह करते हैं जोकि उचित नहीं कहा जा सकता । विवाह के लिए एक वैद्यिक व्यवस्था बताई गई है, "कन्या" से वर (लड़का) हमेंसा उच्च वर्ण का ही होना चाहिए। यदि वर (लड़का) निम्न वर्ण है और कन्या उच्च वर्ण की है, तो इनसे होने बाली संतान वर्णसंकर कहलाती है ।

कौन से आठ प्रकार के विवाह :

१. ब्रह्म विवाह
यह सबसे लोकप्रिय और प्रतिष्ठित विवाह माना जाता है। दोनो पक्ष की सहमति से समान वर्ग के सुयोज्ञ वर से कन्या का विवाह निश्चित कर देना "ब्रह्म विवाह" कहलाता है। सामान्यतः इस विवाह के बाद कन्या को आभूषणयुक्त करके विदा किया जाता है। आज का "आर्रङेद ंअर्रिअगे" ऽब्रह्म विवाहऽ का ही रूप है।

२. दैव विवाह
किसी सेवा कार्य (विशेषतः धार्मिक अनुष्टान) के मूल्य के रूप अपनी कन्या को दान में दे देना "दैव विवाह" कहलाता है। या यूँ समझें कि कन्या का पिता यज्ञ करने वाले पुरोहित को अपनी सुकन्या का हाथ देता था । यह विवाह भी प्राचीन काल में आदर्श विवाह का रूप माना जाता था पर आज इसका प्रचलन नहीं है ।

३. आर्श विवाह
कन्या-पक्ष वालों को कन्या का मूल्य दे कर (सामान्यतः गौदान करके) कन्या से विवाह कर लेना "अर्श विवाह" कहलाता है। यह विवाह प्राचीन काल में ऋषियों की गृहस्थ बनने की इच्छा जाग्रत होने पर विवाह की स्वीकृत पद्धति थी, ऋषी अपने पसंद की कन्या को गाय बैल का जोड़ा भेंट करता था । कन्या के पिता को रिस्ते की स्वीकृति होने पर कन्या का दान करता था । परन्तु अस्वीकृति होने पर भेंट सादर लौटा दिया जाता था ।

४. प्रजापत्य विवाह
कन्या की सहमति के बिना उसका विवाह अभिजात्य वर्ग के वर से कर देना "प्रजापत्य विवाह" कहलाता है।

५. गंधर्व विवाह
परिवार वालों की सहमति के बिना वर और कन्या का बिना किसी रीति-रिवाज के आपस में विवाह कर लेना "गंधर्व विवाह" कहलाता है। यह आधुनिक प्रेमविवाह का पारंपरिक रूप है परन्तु इसे आदर्श विवाह नहीं माना जाता ।

६. असुर विवाह
कन्या को खरीद कर (आर्थिक रूप से) विवाह कर लेना "असुर विवाह" कहलाता है।

७. राक्षस विवाह
कन्या की सहमति के बिना उसका अपहरण करके जबरदस्ती विवाह कर लेना "राक्षस विवाह" कहलाता है। यह विवाह आदिवाशियों के हरण विवाह का ही एक रूप है। एक कबीला दूसरे कबीले से मैत्री करने के उद्देश्य से जीते हुये कबीले की लड़की को देते थे ।

८. पैशाच विवाह
कन्या की मदहोशी (गहन निद्रा, मानसिक दुर्बलता आदि) का लाभ उठा कर उससे शारीरिक सम्बंध बना लेना और उससे विवाह करना "पैशाच विवाह" कहलाता है।

कूर्म अवतार : 11

इस अवतार को आवेशावतार माना जाता है । जब श्रृष्टी कार्य में कोई संकट आये और देवता उन ब्रह्मका आहवाहन करे तो उस कार्य को पूर्ण करने हेतु परमात्मा ने जो अवतार लिया वह आवेश अवतार माना जाता है। मत्स्य, कूर्म, मोहनी आदि अवतार आवेशावतार कहे जाते हैं। कूर्म के अवतार में भगवान विष्णु ने क्षीरसागर के समुद्रमंथन के समय मंदर पर्वत को अपने कवच पर संभाला था। इस प्रकार भगवान विष्णु, मंदर पर्वत और वासुकि नामक सर्प की सहायता से देवों एंव असुरों ने समुद्र मंथन करके चौदह रत्नोंकी प्राप्ती की।

देवराज इन्द्र, दैत्यराज बलि से युद्ध में हार गये स्वर्ग दैत्यों के आधीन था, तब इन्द्र दु:खी हो भगवान विष्णु के पास आये प्रणाम किया और अपनी समस्या बताकर उपाय पूछा।

तब श्रीनारायण बोले- देवराज एक उपाय है कि तुम राजा बली से मैत्री करलो और मिलकर समुद्र का मंथन करो । समुद्र मंथन से जो अमृत निकलेगा वह आप सभी देवता पीलेना तब आप कभी पराजित नहीं होंगे ।

"इन्द्र" राजा बली के समक्ष यह बात रखी और बोले- दैत्यराज हम दोनों भाई हैं, दैत्य और देवता दोनों एक पिता की संतान हैं फिर भी हम आपस में लड़ते हैं । मैं चाहता हूँ हम सब मिलकर समुद्र का मंथन करें । और उसमें से जो अमृत निकले उसे मिलकर पीलें फिर हम भी अमर, तुम भी अमर. हमने सब उपाय सोच लिया बस आप हाँ करदो । इस विशाल कार्य को मन्दर पर्वत और वासुकी साँप के सहारे से ही किया जा सकता था, जहाँ पर्वत को मथिनी का डंडा और वासुकी को रस्सी के समान उपयोग किया गया।

समुद्र का मंथन करने लगे, जहाँ एक तरफ असुर थे और दुसरी तरफ देव थे। लेकिन इस मंथन करने से एक घातक जहर निकलने लगी जिससे घुटन होने लगी और सारी दुनिया पर खतरा आ गया। लेकिन भगवान महादेव बचाव के लिए आए और उस ज़हर का सेवन किया और अपने कंठ में उसे बरकरार रखा जिससे उनका नीलकंठ नाम पड़ा। मंथन जारी रहा लेकिन धीरे धीरे पर्वत डूबने लगा। तभी भगवान विष्णु ने कूर्म अवतार (कछुआ) में अवतीर्ण हुए एक विशाल कछुए का अवतार लिया ताकि अपने पीट कर पहाड़ को उठा सकें। उस कछुए के पीठ का व्यास १००,००० योजन था।

कामधेनु, कल्पवृक्ष, शंख, कौस्तुभमणी, ऐरावतहाथी जैसे १४ रत्नों के साथ अमृत कलश के साथ प्रकट हुआ। इस प्रकार से भगवान का कूर्म अवतार हुआ।

मोहिनी अवतार: 13

भगवान विष्णु ने दैत्यों को मोहित करने के लिए यह अवतार लिया, आवेस अवतार का अर्थ कार्य की पूर्ती के लिए अवतार लेना, और कार्य पूर्ण होने पर अन्तर ध्यान होना इस आवेस अवतार में भगवान माता-पिता का सहारा नहीं लेते अपितु स्वयं यह रूप ग्रहण कर कार्य पूर्ण करते हैं।

२४ अवतारों में मात्र यही एक ऐसा अवतार है जिसमे भगवान विष्णु स्त्रीरूप स्वीकारते हैं । अपने नाम के अनुसार ही भगवान का यह रूप जगत को मोहित करने बाला था, और तो और ब्रम्हयोगी भगवान भोले नाथ भी इनके सुन्दर मोहिनी रूपसे नहीं बच पाये थे ।

इस अवतार का उल्लेख श्रीमद्भागवत पुराण और महाभारत में भी आता है। समुद्र मंथन के समय जब देवताओं व असुरों को सागर से अमृत मिल चुका था, तब देवताओं को यह डर था कि असुर कहीं अमृत पीकर अमर न हो जायें। तब वे भगवान विष्णु के पास गये व प्रार्थना की कि ऐसा होने से रोकें। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार लेकर अमृत देवताओं को पिलाया व असुरों को मोहित कर अमर होने से रोका।

समुद्र मंथन से जब अमृत निकला और भगवान ने यह अमृत देवताओं को पिलाया, उस समय "राहू" चंद्रमा का रूप धारण करके अमृत पीने लगा। तब सूर्य और चंद्रमा ने उसके कपट-वेश को प्रकट कर दिया । यह देख भगवान श्रीहरि ने चक्र से उसका मस्तक काट डाला। उसका सर अलग हो गया और भुजाओं सहित धड अलग रह गया । 

इस प्रकार अमृत पीने से मस्तक कटजाने के बाद भी वह अमर हो गया । अत: मस्तक राहू और धड़ केतू के नाम से प्रकट हुआ । भगवान ने दोनों को नवग्रह में सम्मिलित कर देवताओं के समान पूजित होने का वर्दान दिया । कारण की वह इस घटनाक्रम में निर्दोष था, अपने जीवन को सुरक्षित करने के लिए प्रत्येक जीव कर्म करता है यह उनका स्वभाव है ।

इसी घटना क्रम में एक और कथा आती है की "महादेव शिव" भगवान विष्णु के इस मोहिनी रूप से मोहित हो उनका पीछा करने लगे । तभी भस्मासुर नामका एक दैत्य जो भगवान शिव से वर्दान प्राप्त कर उन्हें ही भस्म करना चाहता था । तब मोहिनीरूप धारी श्रीहरि ने नृत्य का माध्यम बना उस असुर का नास किया । इस प्रकार भोलेनाथ भगवान के इस मोहिनी रुप को प्रणाम किया, इस प्रकार भगवान श्रीहरि ने इस अवतार में देवताओं की रक्षाकर संसार के सृष्टी कार्य को आगे बढाया ।

श्रावण में शिव उपासना क्यों? 2

शिव पुराण के अनुसार देवी सती का देह पिता दक्षके यज्ञ में भस्म होजाने के बाद जब भगवान शिव योग निद्रा में लीन हुये उस समय तारक सुर नाम के दैत्य से सभी देवता व मनुष्य पीड़ित थे । देवराज इन्द्र जब ब्रह्माजी के पास पहुँचे और इस समस्या का हल निकालने को बोले तब ब्रह्माजी ने बताया की तारक असुर को वरदान प्राप्त है की उसकी मृत्यु मात्र शिव पुत्र से ही होगी । परन्तु भगवान शिव इस समय योग निद्रा में लीन हैं और उनकी भार्या देवि सती भी नहीं हैं ऐसे में भगवान शिव के पुत्र होने का प्रश्न ही नहीं उठता । 

इस विषय में, मैं अनभिग्य हूँ नारायण ही इसका निवारण करेंगे । ब्रह्माजी के साथ देवराज इन्द्र भी वैकुण्ठधाम पधारे, भगवान श्रीहरि की स्तुती गाई तब भगवान श्रीहरि बोले- ब्रह्मदेव मृत्युलोक में राजा हिमालय की कन्या पार्वती हैं उन्हीं से शिवजी का विवाह होगा । भगवान विष्णु ने नारद जी के द्वारा संदेशा दिया और नारद जी राजा हिमालय के पास पहुँचे, राजा ने देवऋषि का राजोचित स्वागत किया और आगमन का कारण पूछा, तब नारदजी भगवान शिव के सौन्दर्य, उनकी कृपालुता का बखान करने लगे यह सुन कन्या पार्वती ने मन में ही शिव का वरण कर किया और शिवाराधना में लग गईं । 

एक समय नारद जी वन में पुष्प तोड़ते हुए पार्वती जी से मिले तब पार्वती जी ने नारद जी को अपना गुरू स्वीकारते हुए बोली- गुरुदेव शिव प्राप्ती का उपाय क्या है ? 

नारद जी ने देवी पार्वती को "ॐ नम: शिवाय" यह पंचाक्षरी मन्त्र दिया और बोले- बेटी तुम इस मन्त्र का उच्चारण करते हुये तप करो भगवान शिव अवश्य प्रशन्न होंगे । दीक्षा लेकर पार्वती सखियों के साथ तपोवन में जाकर कठोर तपस्या करने लगीं। उनके कठोर तप का वर्णन शिवपुराण में आया है-

हित्वा हारं तथा चर्म मृगस्य परमं धृतम्। 
जगाम तपसे तत्र गंगावतरणं प्रति॥

माता-पिता की आज्ञा लेकर पार्वती ने सर्वप्रथम राजसी वस्त्रों का अलंकारों का परित्याग किया। उनके स्थान पर मूंज की मेखला धारण कर वल्कल वस्त्र पहन लिया। हार को गले से निकालकर मृग चर्म धारण किया और गंगावतरण नामक पावन क्षेत्र में सुंदर वेदी बनाकर वे तपस्या में बैठ गईं।

ग्रीष्मे च परितो प्रज्वलन्तं दिवानिशम्। 
कृत्वा तस्थौ च तन्मध्ये सततं जपती मनुम ॥१॥
एवं तपः प्रकुर्वाणा पंचाक्षरजपे रता।
दध्यौ शिवं शिवा तत्र सर्वकालफलप्रदम ॥२॥

पार्वतीजी ग्रीष्मकाल में अपने चारों ओर अग्नि जलाकर बीच में बैठ गईं तथा ऊपर से सूर्य के प्रचंड ताप को सहन करती हुई तन को तपाती रहीं। वर्षाकाल में वे खुले आकाश के नीचे शिलाखंड पर बैठकर दिन-रात जलधारा से शरीर को सींचती रहीं।

भयंकर शीत-ऋतु में जल के मध्य रात-दिन बैठकर उन्होंने कठोर तप किया। इस प्रकार निराहार रहकर पार्वती ने पंचाक्षर मंत्र का जप करते हुए सकल मनोरथ पूर्ण करनेवाले भगवान सदाशिव के ध्यान में मन को लगाया। 

एक हजार वर्ष तक मूल और फल का सौ वर्ष केवल शाक का आहार किया। कुछ दिन तक पानी का हवा का आहार किया, कुछ दिन इन्हें भी त्यागकर कठिन उपवास किया। पुनः वृक्ष से गिरी हुई बेल की सूखी पत्तियां खाकर तीन हजार वर्ष व्यतीत किया। जब पार्वती ने सूखी पत्तियां लेना बंद कर दिया तो उनका नाम अपर्णा पड़ गया। पार्वती को कठोर तपस्या की देखकर आकाशवाणी हुई कि हे देवि! तुम्हारे मनोरथ पूर्ण हो गए। अब तुम हठ छोड़कर घर जाओ, भगवान शंकर से शीघ्र मिलन होगा।

तब सावन माह में शिव जी ने देवी पार्वती के तप से प्रसन्न हो दर्शन दिया। यही कारण है की सावन माह में तप, व्रत, अर्चन करने से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं और मनोकामना पूर्ण करते हैं ।