शनिवार, 19 दिसंबर 2015

गण्डमूल / मूल नक्षत्र

मूल, ज्येष्ठा व आश्लेषा बड़े मूल कहलाते है। अश्वनी, रेवती व मघा छोटे मूल कहलाते है। बड़े मूलो में जन्मे बच्चे के लिए 27 दिन के बाद जब चन्द्रमा उसी नक्षत्र में जाये तो शांति करवानी चाहिए ऐसा पराशर का मत भी है, तब तक बच्चे के पिता को बच्चे का मुह नहीं देखना चाहिए। जबकि छोटे मूलो में जन्मे बच्चे की मूल शांति उस नक्षत्र स्वामी के दूसरे 10वें या 19वें दिन में  नक्षत्र में करायी जा सकती है।

यदि जातक के जन्म के समय चद्रमा इन नक्षत्रों में स्थित हो तो मूल दोष होता है। इसकी शांति नितांत आवश्यक होती है। जन्म समय में यदि यह नक्षत्र पड़े तो दोष होता है। 

गण्डमूल में जन्म का फल : 
विभिन्न चरणों में दोष विभिन्न लोगो को लगता है, साथ ही इसका फल हमेशा बुरा ही हो ऐसा नहीं है।  
अश्विनी नक्षत्र में चन्द्रमा का फल :
प्रथम पद में : पिता के लिए कष्टकारी
द्वितीय पद में : आराम तथा सुख केलिए उत्तम 
तृतीय पद में : उच्च पद 
चतुर्थ पद में : राज सम्मान 
आश्लेषा नक्षत्र में चन्द्रमा का फल :
प्रथम पद में : यदि शांति करायीं जाये तो शुभ 
द्वितीय पद में : संपत्ति के लिए अशुभ 
तृतीय पद में : माता को हानि 
चतुर्थ पद में : पिता को हानि 
मघा नक्षत्र में चन्द्रमा का फल :
प्रथम पद में : माता को हानि 
द्वितीय पद में : पिता को हानि 
तृतीय पद में : उत्तम 
चतुर्थ पद में : संपत्ति व शिक्षा के लिए उत्तम 
ज्येष्ठा नक्षत्र में चन्द्रमा का फल :
प्रथम पद में : बड़े भाई के लिए अशुभ 
द्वितीय पद में : छोटे भाई के लिए अशुभ 
तृतीय पद में : माता के लिए अशुभ 
चतुर्थ पद में : स्वयं के लिए अशुभ 
मूल  नक्षत्र में चन्द्रमा का फल :
प्रथम पद में : पिता के जीवन में परिवर्तन 
द्वितीय पद में : माता के लिए अशुभ 
तृतीय पद में : संपत्ति की हानि 
चतुर्थ पद में : शांति कराई जाये तो शुभ फल 
रेवती नक्षत्र में चन्द्रमा का फल :
प्रथम पद में : राज सम्मान 
द्वितीय पद में : मंत्री पद 
तृतीय पद में : धन सुख 
चतुर्थ पद में : स्वयं को कष्ट
अभुक्तमूल
ज्येष्ठा की अंतिम एक घडी तथा मूल की प्रथम एक घटी अत्यंत हानिकर हैं इन्हें ही अभुक्तमूल कहा जाता है, शास्त्रों के अनुसार पिता को बच्चे से 8 वर्ष तक दूर रहना चाहिए यदि यह संभव ना हो तो कम से कम 6 माह तो अलग ही रहना चाहिए मूल शांति के बाद ही बच्चे से मिलना चाहिए अभुक्तमूल पिता के लिए अत्यंत हानिकारक होता है

शनिवार, 5 सितंबर 2015

ग्रहों की शान्ति के लिए करें श्रीगणेशाराधना..

ज्योतिष शास्त्र में बुध ग्रह को भगवान श्रीगणेशजी से संबद्ध किया गया है। यही कारण है की बुधवार के दिन भगवान श्रीगणेश की विशेष पूजा की जाती है। इनकी उपासना नवग्रहों की शांति कारक व व्यक्ति के सांसारिक-आध्यात्मिक दोनों तरह के लाभ की प्रदायक है। अथर्वशीर्ष में इन्हें सूर्य व चंद्रमा के रूप में संबोधित किया है। सूर्य से अधिक तेजस्वी प्रथम वंदनदेव हैं। इनकी रश्मि चंद्रमा के सदृश्य शीतल होने से एवं इनकी शांतिपूर्ण प्रकृति का गुण शशि द्वारा ग्रहण करके अपनी स्थापना करने से वक्रतुण्ड में चंद्रमा भी समाहित हैं। पृथ्वी पुत्र मंगल में उत्साह का सृजन एकदंत द्वारा ही आया है। 

बुद्धि, विवेक के देवता होने के कारण बुध ग्रह के अधिपति तो ये हैं ही, जगत का मंगल करने, साधक को निर्विघ्नता पूर्ण कार्य स्थिति प्रदान करने, विघ्नराज होने से बृहस्पति भी इनसे तुष्ट होते हैं। धन, पुत्र, ऐश्वर्य के स्वामी गणेशजी हैं, जबकि इन क्षेत्रों के ग्रह शुक्र हैं। इस तथ्य से आप भी यह जान सकते हैं कि शुक्र में शक्ति के संचालक आदिदेव हैं। धातुओं व न्याय के देव हमेशा कष्ट व विघ्न से साधक की रक्षा करते हैं, इसलिए शनि ग्रह से इनका सीधा रिश्ता है। 
गणेशजी के जन्म में भी दो शरीर का मिलाप (पुरुष व हाथी) हुआ है। इसी प्रकार राहु-केतु की स्थिति में भी यही स्थिति विपरीत अवस्था में है अर्थात गणपति में दो शरीर व राहु-केतु के एक शरीर के दो हिस्से हैं। 

इसलिए ये भी गणपतिजी से संतुष्ट होते हैं। गणेशजी की स्तुति, पूजा, जप, पाठ से ग्रहों की शांति स्वमेव हो जाती है। किसी भी ग्रह की पीडा में यदि कोई उपाय नहीं सूझे अथवा कोई भी उपाय बेअसर हो तो आप गणेशजी की शरण में जाकर समस्या का हल पा सकते हैं। 

विघ्न, आलस्य, रोग निवृत्ति एवं संतान, अर्थ, विद्या, बुद्धि, विवेक, यश, प्रसिद्धि, सिद्धि की उपलब्धि के लिए चाहे वह आपके भाग्य में ग्रहों की स्थिति से नहीं भी लिखी हो तो भी विनायकजी की अर्चना से सहज ही प्राप्त हो जाती है।

आनंद का प्रतीक "मोदक"

भगवान गणेश का प्रत्येक श्रृंगार व वस्तु हमें शिक्षा देती है। आज हम भगवान श्रीगणेश को अति प्रिय मोदक के विषय में चर्चा करेंगे।

"मोद" यानी आनंद "क" का अर्थ है छोटा-सा भाग। अतः मोदक यानी आनंद का छोटा-सा भाग। मोदक का आकार नारियल समान, यानी "खऽ"नामक ब्रह्मरंध्र के खोल जैसा होता है। कुंडलिनी के "ख" तक पहुंचने पर आनंद की अनुभूति होती है। हाथ में रखे मोदक का अर्थ है कि उस हाथ में आनंद प्रदान करने की शक्ति है। "मोदक" मान का प्रतीक है, इसलिए उसे ज्ञानमोदक भी कहते हैं।

आरंभ में लगता है कि ज्ञान थोड़ा सा ही है (मोदक का ऊपरी भाग इसका प्रतीक है।), परंतु अभ्यास आरंभ करने पर समझ आता है कि ज्ञान अथाह है। (मोदक का निचला भाग इसका प्रतीक है।) जैसे मोदक मीठा होता। वैसे ही ज्ञान से प्राप्त आनंद भी।

दक्षिणाभिमुखी मूर्ति और उत्तराभिमुखी मूर्ति


जिस मूर्ति में सूंड के अग्रभाव का मोड़ दाईं ओर हो, उसे दक्षिण मूर्ति या दक्षिणाभिमुखी मूर्ति कहते हैं। यहां दक्षिण का अर्थ दक्षिण दिशा या दाईं ओर से है । दक्षिण दिशा यमलोक की ओर ले जाने वाली व दाईं बाजू सूर्य नाड़ी की है। जो यमलोक की दिशा का सामना कर सकता है, वह शक्तिशाली होता है व जिसकी सूर्य नाड़ी कार्यरत है, वह तेजस्वी भी होता है।


इन दोनों अर्थों से दाईं सूंड वाले गणपति को ऽजागृतऽ माना जाता है। ऐसी मूर्ति की पूजा में कर्मकांड के अंतर्गत पूजा विधि के सर्व नियमों का यथार्थ पालन करना आवश्यक है। उससे सात्विकता बढ़ती है व दक्षिण दिशा से प्रसारित होने वाली रज लहरियों से कष्ट नहीं होता।

दक्षिणाभिमुखी मूर्ति की पूजा सामान्य पद्धति से नहीं की जाती, क्योंकि तिर्य्*क (रज) लहरियां दक्षिण दिशा से आती हैं। दक्षिण दिशा में यमलोक है, जहां पाप-पुण्य का हिसाब रखा जाता है। इसलिए यह बाजू अप्रिय है। यदि दक्षिण की ओर मुंह करके बैठें या सोते समय दक्षिण की ओर पैर रखें तो जैसी अनुभूति मृत्यु के पश्चात अथवा मृत्यु पूर्व जीवित अवस्था में होती है, वैसी ही स्थिति दक्षिणाभिमुखी मूर्ति की पूजा करने से होने लगती है। इसलिए ऐसी मूर्ति की पूजा करने का मन नहीं करता।


जिस मूर्ति में सूंड के अग्रभाव का मोड़ बाईं ओर हो, उसे वाममुखी कहते हैं। वाम यानी बाईं ओर या उत्तर दिशा। बाई ओर चंद्र नाड़ी होती है। यह शीतलता प्रदान करती है एवं उत्तर दिशा अध्यात्म के लिए पूरक है, आनंददायक है।

इसलिए पूजा में अधिकतर वाममुखी गणपति की मूर्ति रखी जाती है। इसकी पूजा वैद्यिक​ पद्धति से की जाती है। भगवान श्रीगणेश के पास हाथी का सिर, मोटा पेट और चूहा जैसा छोटा वाहन है, लेकिन इन समस्याओं के बाद भी वे विघ्नविनाशक, संकटमोचक की उपाधियों से प्रतिष्ठित किये गए हैं। कारण यह है कि उन्होंने अपनी कमियों को कभी अपना नकारात्मक पक्ष नहीं बनने दिया, बल्कि अपनी ताकत बनाया। उनकी टेढ़ी-मेढ़ी सूंड बताती है कि सफलता का पथ सीधा नहीं है।

गुरुवार, 6 अगस्त 2015

श्रावन मास और सोमवार

मनुष्य जीवन बहुत ही मुश्किल से मिलता है पौराणिक शास्त्रों में कहा गया है कि 84 लाख योनियाँ पार कर आत्मा को यह पंचतत्व से मिश्रित श्रेष्ठशरीर मिलता है, जिसे हम मनुष्य शरीर कहते है । जिसका मुख्य उद्देश्य जीवन को मर्यादा और विभिन्न मार्गों का अनुशरण करते हुए आंतरीक प्राण आत्मा को इश्वर तत्व तक पहुचाना होता है।

शास्त्रों में महादेव को सबसे जल्दी प्रसन्न होने वाले परम अराध्य देव के रुप में जाना जाता है और इसी कारण इन्हें भोलेनाथ के नाम से पुकारा जाता है। भक्तों द्वारा पुकारने व पूजा करने पर यह शीघ्र अति शीघ्र प्रसन्न होकर भक्तों के कष्टों का हरण कर देते है। और यदि व्यक्ति सच्चे मन से शिव का स्मरण करता है तो उसे भी भगवान शिव की असीम कृपा प्राप्त होती है ।

कथा और ताण्डव मंत्र महिमा

कथा:
मित्रो आप सब ज्ञान के धनी है आप सब जानते हैं की लंकाधिपति रावण भगवान शिव का प्रिय भक्त था, वह इतना ऐश्वर्यशाली था की उसके शिव पूजन के लिए स्वयं इन्द्रदेव गंगाजी का जल लेके आते थे और सृष्टिकरता ब्रह्माजी वेद में अष्टाध्यायी का पाठ करते थे । पूजन के बाद रावण प्रार्थना रूपमें ताण्डव स्तोत्र का गान करता था, तब स्वयं शिवजी प्रकट होकर दर्शन दिया करते थे ।

पर आश्चर्य की बात यह है की वह सुखी नहीं था यह उसका मंत्र ही कहता है -
शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ 

हे! शिव मैं आपके मंत्रों का उच्च स्वर से अलाप करता हूँ, पर मैं सुखी कब होउँगा । अर्थात वह सुखी नहीं । तो वह किस सुख की कामना करता था ? वह सुख है "मुक्ती" का । इस राक्षस योनी से मुझे मुक्ती कब मिलेगी यही उसकी कामना थी । 

शिवलिंग

“शिवलिंग” भगवान शंकर का प्रतीक है। उनके निश्छल ज्ञान और तेज़ का यह प्रतिनिधित्व करता है। शिव का अर्थ है- कल्याणकारी। लिंग का अर्थ है - सृजन। 
भगवान शंकर के शिवलिंग की जल, दूध, बेलपत्र से पूजा की जाती है। सर्जनहार के रूप में उत्पादक शक्ति के चिह्न के रूप में लिंग की पूजा होती है। 

सभी देवी-देवताओं की साकार रूप की पूजा होती है लेकिन भगवान शिव ही एक मात्र ऐसे देवता हैं जिनकी पूजा साकार और निराकार दोनों रूप में होती है। शिवपुराण में कहा गया है कि साकार और निराकार दोनों ही रूप में शिव की पूजा कल्याणकारी होती है लेकिन शिवलिंग की पूजा करना अधिक उत्तम है। शिव पुराण के अनुसार शिवलिंग की पूजा करके जो भक्त शिव को प्रसन्न करना चाहते हैं उन्हें प्रातः काल से लेकर दोपहर से पहले ही इनकी पूजा कर लेनी चाहिए। इस दौरान शिवलिंग की पूजा विशेष फलदायी होती है।